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VOL. 1, ISSUE 1 (2015)
रचना-प्रक्रिया की चेतना का विकास और हिन्दी कहानी
Authors
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नंदकिशोर मौर्य
Abstract
रचना-प्रक्रिया आधुनिक आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण विवेच्य विषय है। अगर इसे यथार्थपरक साहित्य के विकास के साथ जोड़कर देखें तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिन्दी कहानी के विकास की पीठिका पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि हिन्दी कहानी में रचना-प्रक्रिया की चेतना का विकास प्रेमचन्द की रचना के साथ ही विकास करता है। वस्तुतः हिन्दी कहानी में यथार्थवादी प्रवृति और रचना-प्रक्रिया, दोनों का विकास साथ-साथ लक्षित किया गया है।
यहां पूर्व निर्धारित रूढ तत्वों या शास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर ही रचना का मूल्यांकन नहीं किया जाता वरन जीवन और जगत से उसके व्यापक सरोकारों की भी पड़ताल की जाती है। अतः यथार्थवादी कहानी को रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में देखने का आग्रह किया गया है। आज की कहानी में कहन के जितने भी प्रयोग और औजार प्रयुक्त किए गए हैं उनमें रचनाकार की रचना-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
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Pages:53-54
How to cite this article:
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नंदकिशोर मौर्य "रचना-प्रक्रिया की चेतना का विकास और हिन्दी कहानी". International Journal of Hindi Research, Vol 1, Issue 1, 2015, Pages 53-54
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