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VOL. 2, ISSUE 1 (2016)
मोहन राकेश के नाटकों में जीवन-सत्य
Authors
बिरमती
Abstract
सत्य एक ऐसा शब्द है जिसमें आयाम की विराटता और विस्तार सन्निहित है। व्यक्ति सत्य से लेकर विश्व-सत्य तक इसकी सीमा में आता है। सृष्टी के आरंभ से आज तक मनुष्य सत्य की खोज में लगा हुआ है। कुल मिलाकर सत्य का जीवन और जगत् से अविच्छिन्न सम्बन्ध है। इसलिए किसी न किसी रुप में सत्य का अन्वेषण, सत्य का अवलम्ब मनुष्य के लिए अपरिहार्य हो जाता है; क्योंकि सत्य से व्यक्ति और समाज के नैतिक और आध्यात्मिक जीवन को बल मिलता है। एक सफल साहित्यकार अपने परिवेश से प्रभावित होता है; किन्तु वह परिवेश को भी प्रभावित करता है। अपने कृत्यों से वह युग पर अपनी छाप छोड़ने में पीछे नहीं रहता। अपने परिवेश से जीवन की विपुल सामग्रियों प्राप्त कर उन्हें युगबोध की जमीन पर अपने सांचे में ढालता है; पुनः वह नवीकृत रूप से इन सामग्रियों को समाज के लिए धरोहर बना देता है।
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Pages:38-40
How to cite this article:
बिरमती "मोहन राकेश के नाटकों में जीवन-सत्य". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 1, 2016, Pages 38-40
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