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VOL. 2, ISSUE 1 (2016)
आधुनिक कहानी में सामाजिक आदर्श का मूल्यांकन शाश्वत प्रदेय के द्वारा
Authors
डॉ0 अनुपमा छाजेड़
Abstract
साहित्य शब्द का अर्थ है सहित होने का भाव। जहाँ शब्द, अर्थ, विचार और भाव का परस्पर सह भाव हो वही साहित्य है, "सामाजिक मस्तिष्क अपने पोषण के लिए जो भाव सामग्री निकाल कर समाज को सौंपता है उसी के संचित भंडार का नाम साहित्य है I" कहानी साहित्य की एक विधा है। कहानी को दो भागों में बाँटा जा सकता है, प्रथम प्राचीन या पूर्वकालीन कहानियाँ व दूसरी आधुनिक कहानी I प्राचीन कहानी और आधुनिक कहानी के शैली शिल्प, रूप अथवा कला का यह अंतर आज बहुत ही स्पष्ट हो गया है I प्राचीन कहानियों की शैली इतिवृत्तात्मक अथवा वर्णनात्मक होती थी। उसमें आरंभ, मध्य, चरमबिदु और अंत का ऐसा विधान बिलकुल नहीं था। उसमें तो सीधे-सादे रूपे में एक राजा था, उसकी सौ रानियां थी, के साथ कहानी का कथानक आरंभ होता था और एक ही गति से "फिर क्या हुआ" की जिज्ञासा को लेकर आगे बढता था और "जैसी उनकी हुई वैसी सब की हो" अंत के साथ समाप्त जाता था l
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Pages:45-47
How to cite this article:
डॉ0 अनुपमा छाजेड़ "आधुनिक कहानी में सामाजिक आदर्श का मूल्यांकन शाश्वत प्रदेय के द्वारा". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 1, 2016, Pages 45-47
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