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VOL. 2, ISSUE 3 (2016)
कबीर के काव्य में धर्म और सामजिकता
Authors
डाॅ0 आभा त्यागी
Abstract
भारतीय संत साहित्य हमारी परम्परा की अनुपम और अद्भुत निधि है। इस साहित्य में तत्कालीन भारतीय समाज के अंर्तद्वन्द्वो का संपूर्ण इतिहास निहित है। ज्ञान को मानवीय संवेदना तथा भगवान मानने से अधिक तर्कमयता आज भी संभव नही है। भारतीय समूची सोच की यह धुरी है यही संवेदित ज्ञान जैन, बौद्ध सम्प्रदायो और ज्ञानाश्रयी संतो के चितंन की आधार भूमि रही है सन्त कवि कबीर के सारे आग्रह मनुष्य जीवन और जगत को संवारने के रहे है। उनकी सारी सोच और चिंताओं का केन्द्र जीव रहा है कबीर के पास कालजयी सोच के साथ मानवतावादी सिद्ध दृष्टि और समुद्र से गहरी संवेदना है। मानव मुक्ति के लिए विस्तीर्ण आकाष जैसा विष्वास है तो अस्तित्व रक्षा के लिए अगाध श्रदामयी शस्य श्यामला, अक्षय जीवन कोषमयी धरती धर्म-धर्म की परिभाषा समय और समाज के अनुसार बदलती जा रही है।
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Pages:45-46
How to cite this article:
डाॅ0 आभा त्यागी "कबीर के काव्य में धर्म और सामजिकता". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 3, 2016, Pages 45-46
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