ARCHIVES
VOL. 2, ISSUE 4 (2016)
हिंदी का वैश्विक स्वरूप
Authors
डाॅ0 गिरधारी लाल लोधी
Abstract
हिंदी को विश्वभाषा व राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने में कठिनाइयां विज्ञान और टेक्नोलाॅजी की शब्दावली की है। अभी हमने जो शब्द गढ़े हैं उनमें अस्पष्टता, अस्वाभाविकता और अंग्रेज़ी की छाप है। वे शब्दकोश में तो जगह पा सकते हैं पर बोलचाल में उनका प्रवेश मुश्किल है। टेक्नोलाॅजी को जैसे हमने तकनीक जैसे सरल शब्द में बदला, कुछ ऐसे प्रयोग की जरूरत है। अंग्रेज़ी को थोड़ा बदलकर शब्द गढ़ने की जरूरत नहीं है, अलेक्जेंडर की जगह सिकंदर जैसे शब्द सही विकल्प है। इसमें भारतीय भाषाएं हमारे बहुत काम आएंगी। मराठी ने भी ट्रांसफार्मर के लिए रोहित्र जैसे अच्छे प्रयोग किए हैं। यूरापीय भाषाओं की तुलना में उर्दू, फारसी, तुर्की, अरबी शब्द हमारे ज्यादा नजदीक है। अंग्रेज़ी के प्रचलन में आ चुके शब्दों को अपनाने में भी कोई बुराई नहीं है। हमें शुद्धतावादी दृष्टिकोण छोड़ना होगा। विज्ञान व तकनीकी शब्दावली की दुरुहता दूर होते ही हिंदी अपने आप सर्वमान्य हो जाएगी। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम इसे विज्ञान और वाणिज्य की भाषा बनाने की दिशा में सार्थक काम करें और सोचें कि हम हिंदी सीखने के इच्छुक देशों के लिए किस तरह हिंदी संसाधन स्रोत बन सकते हैं।
Download
Pages:55-56
How to cite this article:
डाॅ0 गिरधारी लाल लोधी "हिंदी का वैश्विक स्वरूप". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 4, 2016, Pages 55-56
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

