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VOL. 3, ISSUE 1 (2017)
हंस की लंबी कहानियों में दलित-विमर्श के विविध आयाम
Authors
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
’हंस’ में प्रकाशित लंबी कहानियां दलित-विमर्श के नये क्षितिजों का संकेत करती हैं। यहां यह कहने में संकोच नहीं है कि दलित-विमर्श के सारे प्रचलित विवादों को दरकिनार करते हुए ’हंस’ में प्रकाशित ये लंबी कहानियां दलित-विमर्श की स्वस्थ छवि प्रस्तुत करती है, नये दलित उबार को सही अर्थों में हमारे सामने लाने की सार्थक पहल करती है, दलित और गैर दलित साहित्यकारों को दलित अस्मिता के प्रति सचेत और संवेदनशील बनाती है, स्वानुभूति और सहानुभूति के प्रश्न को ध्यान में रखते हुए भी जातीय वैमनस्य से दूर एक बेहतर समाज बनाने के लिए प्रेरित करती है।
समकालीन हिन्दी कहानी को ’दलित कहानी’ ने समृद्ध किया है। उसके फलक को विस्तार देते हुए अधिक सामाजिक और प्रतिबद्ध बनाया है। शास्त्रीय जड़ता और कला की पच्चीकारी से मुक्त कर अधिक सजग और लोकतांत्रिक बनाया है। दलित लेखन प्रगतिशील और जनवादी लेखन की तरह कलावाद का विरोध करता है। दलित लेखक कलापक्ष को लेकर ज्यादा आग्रही नहीं होता वरन् विषयवस्तु या रचना के आशय के प्रति ज्यादा सावचेत रहता है।
कुल मिलाकर दलित कहानीकार पाठक से बड़ी आत्मीयता और सजगता की मांग करता है। पाठक की जरा सी चूक न केवल उसे कहानी के वास्तविक सौन्दर्य से दूर कर देती है वरन् उसके सौन्दर्य बोध को भी कुण्ठित और विकृत कर देती है। इस कसौटी पर यदि इन कहानियों को कसा जाए तो निसंदेह हमें दलित-जीवन से सरोकार रखने वाली ये कहानियां एक नई दृष्टि प्रदान करेंगी।
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Pages:80-82
How to cite this article:
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "हंस की लंबी कहानियों में दलित-विमर्श के विविध आयाम". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 1, 2017, Pages 80-82
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