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VOL. 3, ISSUE 2 (2017)
समकालीन हिन्दी लंबी कहानी में सांप्रदायिक संदर्भ
Authors
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
सांप्रदायिकता और इससे उत्पन्न अन्यान्य समस्याओं के विश्वव्यापी प्रभाव ने समकालीन कहानीकारों के मर्म पर भी गहरी चोट की है जिसका रचनात्मक प्रतिफलन है उनकी ’और अंत में प्रार्थना’, ’सिपाही’, ’मर गया दीपनाथ’, ’कतरनी की मेहंदी’, ’स्वीकारोक्ति’, ’क्रॉस फायरिंग’, ’बोधिवृक्ष’, ’मुक्तियोद्धा’ और ’मैं अब ठीक-ठाक हूं’ जैसी ’हंस’ में प्रकाशित अनगिनत लंबी कहानियां। इन कहानियों की खासियत यह है कि ये बिना हाहाकार मचाए एक गहरी व्यंजना में सांप्रदायिकता के खूनी चेहरे को उघाड़ देती हैं। ये लंबी कहानियां हमें एक बर्बर समय में ले जाती हैं, उस बर्बर समय में जिसकी बर्बरता की अनुगूंज हमें भारतीय समाज और राजनीति में हर पांचवें वर्ष या हर उस वक्त सुनायी देती है जब सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के कारिंदे संस्कृति और धर्म की ठेकेदारी का वर्चस्व दिखाना चाहते हैं।
हंस में प्रकाशित लम्बी कहानियों में हमारे बदलते समय की सांप्रदायिक सोच को आकार मिलता है, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकीर्ण साम्प्रदायिक सोच को उजागर करती हैं.
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Pages:123-125
How to cite this article:
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "समकालीन हिन्दी लंबी कहानी में सांप्रदायिक संदर्भ". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 2, 2017, Pages 123-125
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