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VOL. 3, ISSUE 4 (2017)
केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में सामाजिक यथार्थ का अनुशीलन
Authors
नीता अग्रवाल
Abstract
माक्र्सवादी विचाराधारा से अनुप्राणित प्रगतिवादी काव्य-धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल ने सामाजिक यथार्थ को अपने काव्य का इष्ट बनाया हैं। उनकी कवितायें अनुभव व संवेदनाओं की दीप्ति से जगमगाती, नेह की खुशबू से महमहाती सामाजिक यथार्थ को स्वर देतीं हैं। वे सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति में विश्वास करते हैं और यथार्थ को ही रचना-कर्म का उद्देश्य मानते हैं। उनका साहित्य अपने युग की वास्तविकता का सच्चा प्रतिनिधि है और आने वाले युगों के लिये प्ररेणास्रोत का कार्य करता है। केदार जी ने संसार की वस्तुपरकता से आत्मपरकता स्थापित कर उसे समाज को सम्प्रेषित किया है। यही कारण है कि उनकी कलम से निःसृत विचार जब समाज के सामने आते हैं तो केदार के न रहकर समस्त जन के विचार बन जाते हैं। केदार जी का काव्य जीवन के विकास और संघर्षों के यथार्थ चित्रण पर आधाारित है, जिसका संबंध सामाजिक परिस्थितियों एंव प्रगतिशील प्रवृत्तियों से है। वे इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी को जनता के मन से समूल नष्ट करना चाहते हैं। उन्होंने सामान्य जन-जीवन के प्रति अपने काव्य में जैसी सजगता और जागरूकता दर्शायी है, अन्यत्र दुर्लभ है। सामाजिक यथार्थ की निश्छल अभिव्यक्ति को सर्वबोधगम्य बनाने वाले कवि केदारनाथ अग्रवाल जी की रचनायें वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिक हैं, अतः उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ का अनुशीलन करना ही प्रस्तुत शोध-पत्र का प्रमुख प्रयोजन है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
नीता अग्रवाल "केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में सामाजिक यथार्थ का अनुशीलन". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 4, 2017, Pages 13-15
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