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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 4, ISSUE 2 (2018)
हिन्दी लघुकथा : आकारगत विमर्श
Authors
खेमकरण
Abstract
हिन्दी लघुकथा हेतु बीसवीं सदी का आठवाँ दशक महत्वपूर्ण है। स्वतऩ्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक आदि क्षेत्रों में कई आन्तरिक विक्षोभ उत्पन्न उत्पन्न हुए। परिणाम स्वरूप लघुकथा, पूर्णरूपेण अपने रूप-रंग में ऐतिहासिक परिवर्तन करते हुए कहानी, उपन्यास की तरह सामाजिक दायित्व निभाने लगी। जैन-कथा, बोध-कथा, नैतिक कथा, प्रेरक कथा, पंचतन्त्र की कथा, वेद, पुराण, उपनिषद की कथा, लघु व्यंग्य कथा अथवा लघुआकारीय धार्मिक कथा का चोला त्यागकर पूर्णतः यथार्थवादी आधुनिक विधा बन गई। फलस्वरूप आधुनिक लघुकथाओं में मानवीय चेतना, संवेदना और सामाजिक जीवन-मूल्यों का चित्रण सार्थक रूप में हुआ। अतीत से वर्तमान तक, इन पाँच दशकों का सफर, निस्संदेह लघुकथा के लिए उपलब्धिपूर्ण है। इन दशकों में अपने कत्र्तव्य का निर्वहन कर हिन्दी लघुकथा ने आशातीत प्रगति की है। आठवें दशक तक कहानी, उपन्यास आदि विधाएँ मजबूत स्थिति में थीं। लघुकथा को यह स्थिति इक्कीसवीं सदी में प्राप्त हुई है। इस सदी में मधुमती, नई धारा, संरचना, शोध दिशा, पुश्पगंधा, अविराम साहित्यिकी, अभिनव इमरोज, सृज्यमान, सरस्वती सुमन, हिन्दी चेतना, साहित्य अमृत और सादर इण्डिया आदि विभिन्न पत्रिकाओं ने लघुकथा विशेशांक प्रकाशित कर लघुकथा को सशक्त किया, वहीं दर्जनों ब्लाॅग, नेट पत्रिकाओं ने इसे वैश्विक स्थान प्रदान किया है। प्रस्तुत शोध-पत्र, लघुकथा के आकार प्रकार, विकास, स्थापना, स्वीकृति इत्यादि पर गुणात्मक-आलोचनात्मक रूप में प्रस्तुत है।
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Pages:18-22
How to cite this article:
खेमकरण "हिन्दी लघुकथा : आकारगत विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 2, 2018, Pages 18-22
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