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VOL. 4, ISSUE 3 (2018)
अपने-अपने अजनबी उपन्यास में वैचारिक वातावरण
Authors
डॉ0 बिउटी दास
Abstract
अज्ञेय कृत उपन्यास अपने-अपने अजनबी एक अस्तित्ववादी उपन्यास है। उपन्यास में दो विदेशी केन्द्रीय पात्र सेल्मा और योके के माध्यम से उपन्यासकार ने पात्रों के अंतर्द्व्न्द, अकेलापन, मृत्युभय, आस्था-अनास्था आदि आतंरिक भावनाओं का सुन्दर रूप से अभिव्यक्त किया है । आधुनिक युग में सबसे बड़ी विड़म्बना यह है कि हम साथ होते हुए भी आतंरिक रूप से बहुत अकेले होते हैं । करीब रहकर भी एक-दूसरे को समझ नहीं पाते हैं, एक-दूसरे के अजनबी बने रहते हैं । वर्तमान युग के वैचारिक क्षेत्र में आज काफी बदलाव आये । अत्याधुनिकता के भीड़-भाड़ में फँसकर न जाने हम कब कितने स्वार्थी बन गये । आवश्यकता से ज्यादा व्यवसायिक मुनाफाओं के बारे में हरपल सोचते हैं । अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए ज्यादा जागरूक रहते हैं, प्रतियोगिता की भावनाओं ने हमें एक यन्त्र के रूप में परिवर्तित कर दिया है। दूसरों के अस्तित्व की मूल्य हमारे जीवन मूल्य के आगे फीके पड़ गए हैं । निजीत्व की भावनाओं के कारण हमारे भीतर के सद्वृत्तियॉं प्रायः कम होता चला गया है । पारम्परिक सद्भावना, सहृदयता, प्रेम, दया, ममता जो हमारे जीवन के अपरिहार्य अंग थे आज हमारे मानसिकता में इतने द्रुत परिवर्तन हो गए है कि हमारे जीवन में इन सब सदवृत्तियों की अस्तित्व की असली पहचान करना दराचलत: अपने-अपने अजनबी उपन्यास की मूल संवेदना है ।
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Pages:37-39
How to cite this article:
डॉ0 बिउटी दास "अपने-अपने अजनबी उपन्यास में वैचारिक वातावरण". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 3, 2018, Pages 37-39
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