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VOL. 4, ISSUE 4 (2018)
रूद्र शिव की वैदिक अवधारणा-पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक एवं आचार्य
Authors
डाॅ0 सत्येन्द्र कुमार मिश्र
Abstract
पाशुपत-सम्प्रदाय की उत्पत्ति छठीं-पाॅचवीं शताब्दी ई. पू. में हुई होगी। परन्तु इससे यह अभिप्राय नहीं निकालना चाहिए कि पाशुपत सम्प्रदाय का उद्भव छठवीं-पाॅचवी शताब्दी ई. पू. कि कोई आकस्मिक घटना मात्र है, क्योंकि किसी भी धार्मिक संस्था अथवा विचारधारा का उद्भव विभिन्न प्रवृत्तियों और परम्पराओं और प्रवृत्तियों और परम्पराओं के पारस्परिक आदान-प्रदान एवं संघात के फलस्वरूप होता है, जो कि शताब्दियों से उस मत विशेष में होती रहती है। भारतीय धर्मसाधना और प्रवृत्तियों को निरन्तर सम्मिश्रण होता रहा है। अतः हम किसी भी धार्मिक संस्था अथवा सिद्धान्त को सर्वथा एकेान्मुख नही मान सकते है।
पाशुपत सम्प्रदाय के उद्भव का इतिहास अत्यधिक रोचक है, क्योंकि इसमें भारत की आर्य और अनार्य, वैदिक और अवैदिक, सभ्य और असभ्य, विकसित और अविकसित सभी परम्पराओं के तत्वों का समावेश हुआ है। पाशुपत मत शैव धार्मिक व्यवस्था का प्रथम साम्प्रदायिक उपज है, अतः शैव धर्म की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि में ही पाशुपत सम्प्रदाय के निर्माणत्मक तत्वों का विश्लेषण उचित प्रतीत होता है।
भारत की सन्दर्भ में यह धारणा और भी अधिक समीचीन लगती है क्योंकि यहीं की धार्मिक विचारधारा उदार एवं सविष्णु आधारों पर विकसित हुई थी और इस उदारवादी प्रवृत्ति के कारण सभी धर्मो एवं विचारधाराओं में विभिन्न परम्पराओं और तत्वों को सम्मिश्रण हुआ।
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Pages:13-16
How to cite this article:
डाॅ0 सत्येन्द्र कुमार मिश्र "रूद्र शिव की वैदिक अवधारणा-पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक एवं आचार्य". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 4, 2018, Pages 13-16
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