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VOL. 4, ISSUE 5 (2018)
"भागीरथी-गंगा और कादम्बरी" खण्डकाव्य में मौलिक उद्भावनाएँ
Authors
डाॅ0 दीपा त्यागी
Abstract
भारतीय संस्कृति की मेरुदण्ड स्रोतस्विनी गंगा आध्यात्मिकता का प्रतीक होने के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी जनमानस का उपकार करने वाली है। वर्तमान समय में विडम्बना भरा जीवन व्यतीत करने वाली गंगा की स्थिति नारी समान ही है। भगीरथ की पुत्री गंगा धरा पर आने के पश्चात् रोगनाशिनी मोक्षदायिनी तो कहलायी परन्तु धरा के मानव ने अपने अंधविश्वास एवं भोगविलास पूर्ण जीवन के कारण कुरूप बना दिया। पिता के समान भगीरथ उसके सुखद जीवन के लिए कल्पना करते हैं परन्तु उसकी दुर्दशा पर आहत मन होकर साथ चलने का आग्रह करते है।
प्रस्तुत खण्डकाव्य में भगीरथ के गंगा के प्रति भाव वात्सल्य से परिपूर्ण हृदय वाले पिता के भाव हैं और साथ ही कन्या भ्रूण हत्या, यौन शोषण जैसे कुकृत्यों पर कटाक्ष है। यत्र तल अनाचार भ्रष्टाचार, अन्याय आदि पर भी तीक्ष्ण प्रहार है। विभिन्न युगों में व्याप्त दुराचारियों पर कवयित्री ने कलम से तंज कसा है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गंगा वर्णन में कवयित्री की मौलिक उद्भावनाएँ हैं।
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Pages:58-62
How to cite this article:
डाॅ0 दीपा त्यागी ""भागीरथी-गंगा और कादम्बरी" खण्डकाव्य में मौलिक उद्भावनाएँ". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 5, 2018, Pages 58-62
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