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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 4, ISSUE 6 (2018)
समाज में शांति एवं अहिंसा की स्थापना: धर्म, अध्यात्म और राजयोग की भूमिका - वसुधैव कुटुम्बकम के संबंध में एक संवेदनशील विश्लेषण
Authors
मेधावी शुक्ला
Abstract
प्रस्तुत शोध आलेख में मानव जीवन के सर्वाधिक संवेदनशील पक्षों को उजागर करने का प्रयास किया गया है जिससे ‘ वसुधैव कुटुम्बकम ’ की विराट अभिव्यक्ति से जुड़ी सत्यता का भावनात्मक स्वरुप जीवन के व्यवहार में परिणित हो सकें । सामाजिक जीवन में शांति एवं अहिंसा की स्थापना के परिदृश्य में - ‘ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है ’ का मूल भाव सन्निहित है जो जीवन की गतिशीलता के मध्य आज ओझल सा हो गया है । जीवन में ‘ सर्व - धर्म समभाव ’ का अभिप्राय केवल धर्म - कर्म से सम्बद्ध प्रतीत होता है जबकि ‘ सर्वे - भवन्तु सुखिन:.....’ का संदर्भ अध्यात्म और पुरुषार्थ से अनुप्राणित होता है तथा एक अंतिम आशा के रूप में ‘ वसुधैव कुटुंबकम ’ का वृहद भावार्थ ‘ राजयोग से उपजे गहरे मौन ’ को प्रतिबिम्बित करता है । इस शोध आलेख में अत्यंत सूक्ष्म रूप से इस सत्य को प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया है जिससे समाज में शांति एवं अहिंसा की स्थापना को निर्धारित करने में धर्म, अध्यात्म और राजयोग की स्पष्ट भूमिका का विश्लेषण किया जा सके । यदि मानव स्वभाव द्वारा सहजता से राजयोग की मौलिकता को आत्मिक कल्याण हेतु स्वीकार कर लिया जाए अर्थात् आध्यात्मिक जगत की सूक्ष्म अवधारणा का बोध उसे धर्मगत आचरण के कर्मगत उदाहरण से जीवन को गतिशील रखने की प्रक्रिया में स्थायी रूप से संलग्न कर देता है । जीवन के प्रति धर्म एवं कर्म की स्वीकारोक्ति व्यक्ति को ‘ भक्ति - मार्ग ’ के उच्च आयाम पर स्थापित करते हुए आत्म दृष्टि की श्रेष्ठ प्रक्रिया के लिए मनुष्य को अध्यात्म तथा पुरुषार्थ द्वारा ‘ ज्ञान - मार्ग ’ की ओर अग्रसर हो जाने के लिए प्रेरित करती है । अत: आत्मिक विकास से व्यक्ति अपने जीवन में ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति से अभिभूत होकर राजयोग और मौन के ‘ पवित्र - मार्ग ’ की ओर गतिशील होता है जो सामाजिक ‘ शांति एवं अहिंसा ’ की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम हो जाता है ।
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Pages:21-23
How to cite this article:
मेधावी शुक्ला "समाज में शांति एवं अहिंसा की स्थापना: धर्म, अध्यात्म और राजयोग की भूमिका - वसुधैव कुटुम्बकम के संबंध में एक संवेदनशील विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 6, 2018, Pages 21-23
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