ARCHIVES
VOL. 5, ISSUE 4 (2019)
हिन्दी के गुप्त भूषण : कुमाउँनी लोकसाहित्य एंव साहित्य
Authors
नमन जोशी
Abstract
कुमाउनी बोली पहाड़ी उपभाषा की प्रमुख बोली हैं, जो उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में काफी प्रचलित है, एंव जनभाषा के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी करती हैं। सर् जार्ज ग्रियर्सन गुमानी पंत जी (सन् 1790-1846) को कुमाउनी बोली का पहला कवि मानते है। कुमाउनी लोकसाहित्य एंव साहित्य हिन्दी के गुप्त आभूषणों की भांति है जो स्वंय अधंकार में रहकर हिन्दी की चमक बढ़ाने हेतु निरंतर अथक प्रयास कर रहें है। ये अंवश्य सत्य है कि कुमाउनी का अभिजात्य साहित्य हिन्दी की अन्य बोलियों के साहित्य की तरह इतना व्यापक नहीें हैं, परन्तु जिन कठिन एंव दुर्गम परिस्थितियों में इस साहित्य को लिखा और सरंक्षित किया गया, वो स्वंय में अन्य बोलियो एंव भाषाओं के लिये प्रेरणास़्त्रोत हैं। ये तथ्य अवश्य ही विचारणीय है कि जिस गुमानी को हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का पहला कवि होने का गौरव प्राप्त हो सकता था, उस गुमानी को हिंदी साहित्य के चर्चित इतिहास के ग्रंथो में स्थान तक नहीं दिया गया और ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कुमाऊं के विस्तृत क्षेत्र (चम्पावत, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर, उधम सिंह नगर, नैनीताल) में अभिजात्य साहित्य की क्रांति लाने वाले गुमानी को हिंदी साहित्य से पृथक और उपेक्षित रखा गया। जिस दौर में हिंदी साहित्य के रीतिकालीन कवि भोग विलासता का जीवन व्यतीत कर रहे थे, उसी दौर में कुमाऊं के कृष्णा पाण्डेय जैसे कवि अंग्रेजी सत्ता का खुला विरोध कर लोकभाषा में जनता को जागरूक करने का कार्य भी कर रहे थे। इसके अतरिक्त कुमाउनी बोली के पास वो शब्द सम्पदा मौजूद है, जो हिंदी भाषा के उत्थान में मदद कर सकती है। ऐसे में हिंदी से ये उम्मीद अवश्य लगाई जा सकती है कि वो कुमाउनी कि शब्द सम्पदा को गृहीत कर अवश्य ही अपनी बोली को भाषा में सम्मानित स्थान देगी।
Download
Pages:62-65
How to cite this article:
नमन जोशी "हिन्दी के गुप्त भूषण : कुमाउँनी लोकसाहित्य एंव साहित्य". International Journal of Hindi Research, Vol 5, Issue 4, 2019, Pages 62-65
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

