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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 6, ISSUE 2 (2020)
हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संघर्ष, वर्तमान परिवर्तन व चुनौतियाँ
Authors
मनोज कुमार
Abstract
भारत एक बहुभाषी, बहुधर्मी तथा बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ अनेकों आदिवासी जनजातियाँ पाई जाती हैं। भारत की जनसंख्या में लगभग आठ प्रतिशत आदिवासी हैं। यह आँकड़ा पूरी तरह से विश्वनीय नहीं है, क्योंकि इसमें केवल वही आदिवासी समूह आते हैं, जिनके नाम भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की अनुसूचित जनजातियों की कुल जनसंख्या 8.6 करोड़ है। आदिवासियों को भारतीय संविधान में’अनुसूचित जनजाति’ (scheduled tribes) के नाम से संबोधित किया गया है। आदिवासी से अभिप्राय देश के मूल एवं प्राचीनतम निवासियों से है। आज हम जिस समाज में रहते हैं उस समाज में आज भी कुछ ऐसी आदिवासी जनजातियाँ हैं, जो मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं। आदिवासी जनजातियों का जीवन पूरी तरह से जंगल पर निर्भर है। उसे भी बाहरी (सभ्य समाज) लोगों ने हड़प लिया है। हजारों वर्षों से जंगलों में रह रहीं आदिम जनजातियाँ खुले मैदानों तथा सभ्यता के केन्द्रों में बसे लोगों (सभ्य समाज) से अधिक सम्पर्क स्थापित किए बिना ही अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं। अनेक समस्याओं को हिंदी उपन्यासकारों ने उकेरा है और इन्हें हाशिये से निकालकर हम भी मानव हैं, हमें भी उतना ही हक है जितना यहाँ के गावों में, नगरों में रह रहे मानवों को है का संदेश आदिवासियों एवं अभिजात जातियों, धर्मों के लोगों को दिया है। आदिवासी साहित्य पर जब हम विचार करते हैं तो निश्चित रूप से आदिवासी समुदायों में जगा ‘आत्मभान’ हमारा ध्यान खींचता है। आज भारतीय स्तर पर आदिवासी साहित्य की चर्चा शुरू है। अनेक भारतीय भाषाओं में आदिवासियों की जीवन समस्या, जीवन संघर्ष और शोषण को लेकर साहित्य लिखना आरंभ हुआ है। यह साहित्य आदिवासियों की ‘जल-जमीन-जंगल’ से खदेड़ने की त्रासदी को डंके की चोट पर व्यक्त कर रहा है। आदिवासी साहित्य स्पष्ट कर रहा है कि हम यहाँ के मूल निवासी हैं और आज हमें ही निर्वासित किया जा रहा है।
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Pages:12-15
How to cite this article:
मनोज कुमार "हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संघर्ष, वर्तमान परिवर्तन व चुनौतियाँ". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 2, 2020, Pages 12-15
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