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VOL. 6, ISSUE 3 (2020)
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आदिवासी का विस्थापन
Authors
किरण नामदेवराव कुंभरे
Abstract
समय बदलता है और इसके साथ मनुष्य की जीवन शैलीयाँ भी बदलती रहती है। परिवर्तन होना यह संसार का नियम है, इसे कोई भी रोक नहीं सकता यह सत्य है लेकिन मनुष्य का मस्तिष्क ही ऐसे है जो हमेशा क्रियाशील होता है। तकनीकि संचार के साधन दिन ब दिन उपलब्ध होते जा रहे है अब दुनिया में कोई ऐसे काम नहीं जो नामुनकिन हो, सबकुछ मुनकिन है। वैश्वीकरण केवल एक देश, एक राष्ट्र,एक राज्य तक सीमित नहीं है यह तो समस्त विश्व के लिए लागू होने वाली प्रक्रिया है। आदिवासी और वैश्वीक का अंतर्सबंध किस तरह से जुड़ा हुआ है एवं वैश्वीकरण कैसे आदिवासियों के बीच में काम करता है। जो आज के समय में वैश्वीकरण ने किसी को भी छोडा नहीं है। भारत देश आजादी के बाद में अपने आपको स्वतंत्र हुआ महसूस करता है लेकिन आदिवासी समुदाय खुदको स्वतंत्र न पाकर अपने आपको सामंजस्य की स्थिती महसूस करता है, क्योंकि आज भी उनकी कुछ ऐसी जटिल समस्याएं है जैसे जल, जंगल, जमीन की समस्याएं जिनसे आदिवासी अभी भी झुंझते हुए दिखाई देते है। उनका ग्रामीण और शहरी भागों से संपर्क सही ढंग से नहीं हो पाता है। वैश्वीक परिदृश्य में आदिवासियों के सामने विस्थापन, बांध, पुर्नवसन, भूमि हस्तांतरण ऐसी समस्याओं का सामना आदिवासीयों को करना पड रहा है। ऐसे में आदिवासियों को बडी बेबाकी के साथ परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है। आदिवासी अपनी अस्मिता की लडाई लड़ रहा है। इस लेख में आदिवासी से जुड़े कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास लिया है और वैश्वीक स्तर पे आदिवासी की अस्मिता को बताने का प्रयास किया है।
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Pages:33-39
How to cite this article:
किरण नामदेवराव कुंभरे "वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आदिवासी का विस्थापन". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 3, 2020, Pages 33-39
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