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VOL. 6, ISSUE 5 (2020)
वर्तमान परिदृश्य में अनुवाद की प्रासंगिकता
Authors
अर्चना श्रीवास्तव
Abstract
वसुदेव कुटुम्बकम की भावना के साथ ही अनुवाद अनिवार्य अंग बन गया। इसीलिए बीसवीं सदी को अनुवाद का युग कहा गया है। वस्तुतः अनुवाद सबसे प्राचीन व्यवसायों में से एक है लेकिन उसकी महत्ता जिस तरह बीसवीं सदी में महसूस की गई वैसे पहले कभी नही रही। इसका मूलतः कारण यह है कि इस दौरान विभिन्न भाषाभाषियों के समुदाय सम्पर्क में आए। एक दूसरे की संस्कृति एवं विचारों को समझने का इससे आसन कोई भी साधन प्रतीत नही हुआ। यह प्रश्न कि अन्य भाषियों के समुदाय का जड़चेतन (विचार एवं संस्कृति) का अस्तित्व ग्राह्य कैसे ह® ? समुदाय विशेष की गुणवत्ता एवं जीवन के तत्वों को कैसे जाना एवं आत्मसात किया जा सकता है? तब इसी माध्यम ने राजनीतिक-आर्थिक सेतु का कार्य किया। वैश्विक पटल पर समीकरण को समझने एवं बदलने में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। किसी भी भाषा की समझ एवं संस्कृति के संरक्षण हेतु अनुवाद ने एक अचूक हथियार का कार्य करता है।
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Pages:170-173
How to cite this article:
अर्चना श्रीवास्तव "वर्तमान परिदृश्य में अनुवाद की प्रासंगिकता". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 5, 2020, Pages 170-173
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