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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
सिद्ध साहित्य की प्रवृत्तियां एवं विशेषताएं
Authors
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय
Abstract
सिद्ध साहित्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। आदिकालीन सिद्धों ने कविता की जो प्रवृत्तियां आरंभ की, उनका प्रभाव भक्तिकाल तक चलता रहा। कबीर की कविता में जो रूढ़ियों का विरोध या अख्खड़पन मिलता है; वह इन सिद्ध कवियों की ही देन है। आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि, “84 सिद्धों में बहुत से कछुए, चमार, धोबी, डोम, कहार, लकड़हारे, दर्जी तथा बहुत से शूद्र कहे जाने वाले लोग थे। अतः जाति-पांति के खंडन तो ये स्वयं ही थे।“ सबसे पहले दोहा-चौपाई पद्धति का प्रयोग सरहपा ने किया। इनकी भाषा तो हिंदी ही है, केवल उस पर यत्र-तत्र अपभ्रंस का प्रभाव है। वज्रयानियों को ही सिद्ध कहा गया। सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जनभाषा में लिखा वह हिंदी के सिद्ध साहित्य की सीमा में आता है। सिद्धों ने वर्णाश्रम धर्म पर तीव्र प्रहार किया। इन्होंने संध्या भाषा-शैली में रचनाएं की हैं। राहुल सांकृत्यायन ने 84 सिद्धों के नामों का उल्लेख किया है। जिनमें सिद्ध सरहपा से यह साहित्य आरम्भ होता है। 84 सिद्धों में सरहपा, सबरपा, लुईपा, डोम्भिपा, कण्हपा, कुक्कुरिपा इत्यादि, हिंदी के प्रमुख सिद्ध कवि हैं। सिद्धों के आगे पा शब्द जुड़ा रहता है जो आदर सूचक है। 84 सिद्धों में कई योगनियां भी शामिल हैं। सिद्धों के योगदान को प्रस्तुत लेख में रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।
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Pages:167-168
How to cite this article:
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय "सिद्ध साहित्य की प्रवृत्तियां एवं विशेषताएं". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 167-168
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