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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
'सेवासदन’ मे नारी विमर्श का दर्शन
Authors
डॉ. संतोष रामचंद्र आडे
Abstract
सेवासदन’ उपन्यास द्वारा नारी जाति की परवशता, निस्सहाय अवस्था, आर्थिक एवं शैक्षिक परतंत्रत, अर्थात नारी दुर्दशा पर आज के हिंदी साहित्य में जितनी मुखर चर्चा हो रही है, बीसवी सदी के प्रारंभ में कथा सम्राट प्रेमचंद के साहित्य में ज्यादा मुखर थी। नारी जीवन की समस्याओं के साथ-साथ समाज में धर्माचार्यों, मठाधीशों, सुधारकों के आडंबर, दंभ, ढोंग, पाखंड, चरित्रहीनता, दहेज-प्रथा, बेमेल विवाह, पुलिस की घुसखोरी, वेश्यागमन, मनुष्य के दोहरे चरित्र, साम्प्रदायिक द्वेष आदि सामाजिक विकृतियों के घृणित विवरणों से भरा उपन्यास “सेवासदन“ आज भी समकालीन और प्रासांगिक बना हुआ है। इन तमाम विकृतियों के साथ-साथ यह उपन्यास घनघोर दानवता के बीच कहीं मानवता का अनुसंधान करता है। अतिरिक्त सुखभोग की अपेक्षा में अपना सर्वस्व गवॉं लेने के बाद जब कथानायिका को सामाजिक गुणसूत्रों की समझ हो जाती है, तब वह किसी तरह दुनिया के प्रति उदार हो जाती है और उसका पति साधु बनकर अपने व्यक्तित्व दुष्कर्मों का प्रायश्चित करने लगता है, जमींदारी अहंकार में डूबे दंपति अपनी तीसरी पीढ़ी की संतान के जन्म से प्रसन्न होते है, और अपनी सारी कटुताओं को भूल जाते है। ये सारी स्थितियॉं उपन्यास की कथाभूमि में इस तरह पिरोई हुई है कि तत्कालिन समाज की सभी अच्छाइयों, बुराइयों का जीवंत चित्र सामने आ जाता है. हर दष्टि से यह उपन्यास एक धरोहर है और आज के नारी जीवन से प्रमाणित करता हुआ नजर आता है, इसलिए यह उपन्यास आज भी प्रासांगिक लगता है
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Pages:102-104
How to cite this article:
डॉ. संतोष रामचंद्र आडे "'सेवासदन’ मे नारी विमर्श का दर्शन". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 102-104
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