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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
समकालीन हिंदी कथालोचना और मधुरेश
Authors
अशोक कुमार मौर्य
Abstract
नया साहित्य अपने लिए नया मूल्य बोध सृजित करता है नए मूल्य पुराने के विरोधी नहीं पर अनिवार्यतह उसके अनुगामी भी नहीं होते ⅼ जीवित साहित्य वही है जो अपनी परंपरा परिवेश और समकाल से संबद्ध और संवादरत हो ⅼ अपनी परंपरा परिवेश और समकाल से उसकी यह संबद्धता और संवादधर्मिता ही परंपरा के प्रवाह और आधुनिक समकालीनता के नैरन्तर्य का आधुनिक और वैज्ञानिक आधार है ⃓ समकालीन साहित्य में कथा साहित्य की परंपरा नई नहीं है, कथा कहने और सुनने की परंपरा का निरंतर विकास होता रहा है ⅼ कथा की संवेदना मनुष्य के इर्द-गिर्द ही सृजित होती है ⅼ मनुष्य के सुख-दुख, हास-परिहास, उचित- अनुचित, न्याय-अन्याय, के साथ-साथ समाज के शिक्षण एवं मनोरंजन, कथा साहित्य की आधारशिला निर्मित करते हैं क्योंकि साहित्य की संवेदना में मनुष्य और उसका समाज सन्निहित है तो उस साहित्य का अपना प्रतिमान मानदंड एवं मूल्य बोध भी होगा जिससे कि साहित्य का मूल्यांकन भी हो सके ⅼ साहित्य को देखने परखने और उसकी समीक्षा आलोचना एवं मूल्यांकन से साहित्य को समाज उपयोगी और शास्त्रीय बनाया जा सकता है ⃓शास्त्रीयता से मेरा आशय विशुद्ध साहित्य रूप है ⅼ भारतीय हिंदी साहित्य आलोचना नाट्य-काव्यास्रित रहा है ⅼ परन्तु आधुनिक हिंदी साहित्य में जैसे-जैसे गद्य का विकास हुआ वैसे-वैसे आलोचना के रूप और पद्धति में भी परिवर्तन देखने को मिलता है ⅼ इसी प्रक्रिया में कथा लोचना का भी विकास संभव हो सका ⅼ
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Pages:105-108
How to cite this article:
अशोक कुमार मौर्य "समकालीन हिंदी कथालोचना और मधुरेश". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 105-108
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