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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 1 (2021)
योग में ईश्वर की अवधारणा
Authors
हर्षवर्धन गोस्वामी
Abstract
भारतीय दर्शन मूल रूप से दो वर्गों में विभाजित है आस्तिक दर्शन तथा नास्तिक दर्शन । आस्तिक दर्शनोें में योग दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है जो मानव जीवन में अध्यात्म, वाद-विवाद या तर्कशास्त्र को महत्व न देते हुए जीवन के उत्थान के लिए मानव देह के व्यावहारिक प्रयोगात्मक पक्ष पर विशेष बल देता है। इसी कारण इस दर्शन में आसन, प्राणायाम, यौगिक क्रिया आदि के माध्यम से आध्यात्मिक उपलब्धि पाने की बात दर्शई गई है। इसी विशेषता के कारण प्राचीन से लेकर आज तक ‘योग‘ अपनी उपयोगिता बनाये हुए है। ईश्वर की उपयोगिता योगसाधन में नितान्त मौलिक हैै। ईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि मानी जाती है। प्रणिधान से क्लेश क्षीण हो जाते है। जो समाधि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा परिश्रम से साध्य होती है। उसका सम्पादन इस प्रणिधान से सुगमता से हो जाता है। अतः समाधि की सिद्धि का सरल-साधन ईश्वर-प्रणिधान हैै। योग भारतीयों की विशिष्ट सम्पत्ति है। जिनका विज्ञान की भाँति अनुशीलन किया है तथा उन्नति की चरम सीमा पर पहंुचा दिया है। काया और चित्त को मलों से निर्मुक्त कर पुरूष की आध्यात्मिक उन्नति में उपयोग करना ’योग‘ ने ही सिखाया हैं योग व्यावहारिक है। इसकी तत्त्वमीमांसा सांख्य के समान है। आधुनिक युग में योग की महत्ता अत्याधिक हैै। भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों जगत् में मनुष्य योग क्रियाओं के प्रति आकृष्ट हुए हैं। आज के भौतिकवादी युग में मानव को मानसिक शान्ति, शरीर को स्वस्थ रहने में ’अष्टांग योग की अत्यधिक महत्ता है।
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Pages:82-85
How to cite this article:
हर्षवर्धन गोस्वामी "योग में ईश्वर की अवधारणा". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 1, 2021, Pages 82-85
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