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VOL. 7, ISSUE 5 (2021)
वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों में व्यक्त राजनीतिक बोध
Authors
लक्ष्मी देवी
Abstract
आज ग़ज़ल नायक-नायिका के प्रेम भरी बातचीत का पर्याय नहीं है बल्कि युग परिवर्तन के साथ-साथ ग़ज़ल के आंतरिक विषय में भी बदलाव आया है। आज का गज़लकार समाज में भ्रमात्मक संस्कृति के खोखले दावों की पहचान रखता है इसलिए वह ऐसे मनगढंत दावों का प्रतिरोध करता है | इनके पांच ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं | वशिष्ठ जी ने देश की राजनीतिक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, चुनाव प्रणाली, संसद का चित्रण, राजनीतिक भ्रष्टाचार, पुलिस व्यवस्था, झूठे आश्वासन, परिवारवाद और नेताओं के मुखौटों को उतारा है। राजनीति अर्थात शासक द्वारा बनाई गई नीति जिसमें जनता के हित को केन्द्र में रखा जाता था। आज बिल्कुल विपरीत परिस्थितियां हैं, अधिकांश नेता भ्रष्ट हैं जिस कारण उनका लक्ष्य स्वयं का कल्याण करना होता है। ग़ज़लकार ने गज़लों के माध्यम से जागृत करने का प्रयास किया है कि धर्म, प्रांत, जाति आदि के नाम पर किए जाने वाले प्रदर्शन इश्वर निर्मित नहीं होते बल्कि वोट बैंक साधने का तरीका होता है।
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Pages:58-63
How to cite this article:
लक्ष्मी देवी "वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों में व्यक्त राजनीतिक बोध ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 5, 2021, Pages 58-63
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