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VOL. 7, ISSUE 5 (2021)
संजीव के उपन्यासों में आदिवासी चित्रण
Authors
दीपा त्यागी, ममता
Abstract
आदिवासी समाज में संघर्षों की परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है। इनके जल, जंगल व जमीन पर जब दूसरे समुदाय ने आक्रमण किया तब-तब इन्होंने विद्रोह व आंदोलन किए। आदिवासी की वेदना इतनी गहरी है कि मनुष्य की आत्मा चीत्कार करने उठती है वह सदैव शोषित होता रहा है अपने अधिकारों के लिए लड़ता रहा है वह आज भी दयनीय स्थिति में है। संजीव जी ऐसे कथाकार व उपन्यासकार है जो उपेक्षित व शोषित होते आदिवासी की दयनीय स्थिति को साहित्य के माध्यम से प्रकट करते हैं। संजीव का कथा साहित्य आदिवासी को स्वर देता है जो आज तक उपेक्षित था वह साहित्यकार की वाणी पा कर अपनी चेतना को जगा कर समाज में अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम हैं। संजीव के उपन्यास पाँव तले की दूब, जंगल जहाँ शुरू होता है, धार, सावधान! नीचे आग है, सर्कस इत्यादि उपन्यास हैं जो आदिवासी की मेहनतकश, अभावग्रस्त जिंदगी के दुःख दर्द को साहित्य के माध्यम से चित्रित करते हैं। उनका लेखन सिर्फ दयनीय व पीड़ित स्थितियों का चित्रण ही नहीं करता वरन् शोषित व उपेक्षित होते लोगों का विरोध भी भरसक करता है उनका साहित्य उपेक्षित आदिवासी को वाणी देता है। जो भविष्य में प्रांसगिक है।
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Pages:111-115
How to cite this article:
दीपा त्यागी, ममता "संजीव के उपन्यासों में आदिवासी चित्रण ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 5, 2021, Pages 111-115
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