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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
हिन्दी साहित्य में कबीर दर्शन के मायने
Authors
शिवहरी
Abstract
कबीर मुख्य रूप से आलोचनात्मक चेतना, प्रश्न करने की प्रवृत्ति और अनुभव आधारित सत्य का वक्ता होने के साथ धार्मिक विभेद, बाह्याचारों और वेदपुराण की सत्ता को चुनौती देते हैं। उनका रहस्यवाद सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से पीड़ित जनता को यह यथार्थ बता रहा था कि मनुष्य का असली धर्म इस मायालोक से मुक्त होने में है। किसी धर्म-मत-सम्प्रदाय और ढाँचे में न बंधने वाले कबीर को यदि हम हिन्दी साहित्य, सगुण, कवि और संत जैसी सीमाओं में पिरो दे और कबीरपंथियों के प्रमाणीकरण का इंतजार करें तो कबीर सिर्फ वह कबीर होगा जिस पर धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक हथकंडे, बहस व विवाद किए जा चुके हैं। हिन्दी साहित्य में अपने कबीर पर हुए शुरुआती लेखन की बहस व विवादों से कई मुद्दे जैसे अकादमिक बहस, धार्मिक-जातीय बहस के साथ-साथ कबीर दर्शन को भी संक्षिप्त में समझने की है जिसमें हमारा अनुमान है कि सम्पूर्ण सत्तामीमांसा के दार्शनिक कबीर को हिन्दी साहित्य के एकल सत्तामीमांसा प्रारूप में समझना कबीर की अपूर्ण समझ होगी।
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Pages:38-40
How to cite this article:
शिवहरी "हिन्दी साहित्य में कबीर दर्शन के मायने". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 38-40
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