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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
परमहंस योगानंद का यौगिक अवदानः एक विवेचन
Authors
प्रवीण कुमार गुप्ता, संदीप ठाकरे
Abstract
जीवन में सतत् प्रसन्नता और आनन्द की अनुभूति हेतु परिवर्तन करना ही क्रियायोग का मुख्य उद्देश्य है। क्रियायोग के अभ्यास से हम अपने जीवन के रहस्यों को समझते है। इसके अभ्यास से साधक की चेतना शुद्धतर होती रहती है। क्रियायोग के अभ्यास से साधक में परिवर्तन आते रहते है- क्रियायोग के अभ्यास से साधक के अवचेतन मन में छिपे भय, चिन्ता, परेशानी, विचारों में संघर्ष, गलत धारणाओं तथा मानसिक विचारों की विक्षिप्तता इत्यादि छिपे हुए संस्कारों की सफाई होती रहती है। इस प्रकार क्रियायोग गहराई से लेकर सतह तक सम्पूर्ण मन में समन्वय लाता है। योग मार्ग में सफलता पाने के लिए सबसे तीव्र और सबसे अधिक प्रभावशाली विधि जो सीधे उर्जा और चेतना का प्रयोग करती है। यह सीधा मार्ग है जो आत्मज्ञान के एक विशेष तरीके पर बल देता है जिसे परमहंस योगानन्दजी ने सिखाया है। विशेषतया, क्रिया राजयोग की एक ऐसी विकसित विधि है जो शरीर में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा की धारा को सशक्त और पुनर्जीवित करती है जिससे हृदय और फेफड़ों की सामान्य गतिविधि स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है। इसके फलस्वरूप चेतना, बोध के उच्चतर स्तर पर उठने लगती है जो क्रमशः धीरे-धीरे अंतः करण में आंतरिक जागृति लाती है जो मन एवं इंद्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के भाव से कहीं अधिक आनंदमय व गहरा आत्मसंतोष प्रदान करने वाली होती है। भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रियायोग की चर्चा दो बार की है। एक श्लोक में वे कहते हैंः “अपान वायु में प्राणवायु के हवन द्वारा और प्राणवायु में अपान वायु के हवन द्वारा योगी प्राण और अपान, दोनों की गति को रुद्ध कर देता है और इस प्रकार वह प्राण को हृदय से मुक्त कर लेता है और प्राणशक्ति पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है।” तात्पर्य यह है कि “योगी फेफड़ों और हृदय की कार्यशीलता को शान्त कर प्राणशक्ति की उस अतिरिक्त आपूर्ति की सहायता से शरीर में होने वाले ह्रास को रोक देता हैय और अपान को नियंत्रण में कर वह शरीर में वृद्धत्व लाने वाले परिवर्तनों को भी रोक देता है। इस प्रकार ह्रास और वृद्धि, दोनों को रोककर योगी प्राण-नियंत्रण सीख लेता है।”
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Pages:55-60
How to cite this article:
प्रवीण कुमार गुप्ता, संदीप ठाकरे "परमहंस योगानंद का यौगिक अवदानः एक विवेचन". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 55-60
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