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VOL. 8, ISSUE 5 (2022)
निराला साहित्य में स्त्री संचेतना
Authors
डॉ0 प्रमिला यादव
Abstract
प्राचीन भारत में स्त्री का अत्यधिक महत्व था। वह समाज में आदर तथा सम्मान की पात्र थी। उसे चहुँमुखी विकास करने का अवसर प्राप्त था। विवाह, शिक्षा, सम्पत्ति में वह बराबर का अधिकार रखती थी। पुत्री, पत्नी और माता के रूप में उसको अत्यधिक आदर प्राप्त था। वह पुरुष की अर्द्धांगिनी मानी जाती थी। उसे लक्ष्मी के रूप में सुख प्रदान करने वाली माना जाता था। किन्तु उसकी स्थिति ज्यादा समय तक ऐसी नहीं रही। परवर्ती कालखण्डों में सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तनों के कारण उसकी स्थिति में युगानुरूप परिवर्तन आते रहे। यह ह्रासिक परिवर्तन वैदिक युग से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक उत्तरोत्तर बढ़ता रहा। ’निराला’ युगद्रष्टा कवि थे। वह अपनी प्राचीन संस्कृति से पूर्णतया भिज्ञ होने के साथ ही वर्तमान के क्षरित होते सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के सचेत चिंतक भी थे। वह देख रहे थे कि लम्बी गुलामी से उपजी शोषण व्यवस्था के कारण देश और समाज दोनों खोखले होते जा रहे हैं। अस्तु उन्होंने देश तथा समाज की विकृत होती व्यवस्था के लिए जिम्मेदारों के खिलाफ अपनी लेखनी का प्रयोग निर्भीकता के साथ किया। नारी शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी। वस्तुतः निराला के प्रबल समर्थन की पात्र बनी। उनकी दृष्टि में नारी इस सृष्टि में पुरुष की जीवन-प्रेरणा का स्त्रोत है। इसीलिए उनके समस्त साहित्य में नारी के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वस्थ और स्नेहपूर्ण रूप में मिलता है।
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Pages:46-49
How to cite this article:
डॉ0 प्रमिला यादव "निराला साहित्य में स्त्री संचेतना". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 5, 2022, Pages 46-49
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