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VOL. 9, ISSUE 2 (2023)
विष्णु प्रभाकर के नाटकों में मानवतावादी स्वर
Authors
डॉ. अनीता यादव
Abstract
सत्य, त्याग, अहिंसा, समता, न्याय, वसुधैव कुटुंबकम ऐसे मूल्य हैं जो सर्वकालिक है। इन्हीं को आत्मसात करने से जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। जीवन की इन मूल्यों के बिना कल्पना संभव नहीं है। विश्व में प्रेम हो युद्ध न हो घृणा न हो। मनुष्य प्रेम का मार्ग अपनाएं यही विष्णु प्रभाकर की आकांक्षा रही। यही कारण है कि उनके नाटकों में सर्वत्र प्रेम, स्नेह, विश्वास, मानवता, दया श्रद्धा के जीत होती है। नाटकों में व्यक्ति टूटता है फिर जुड़ता है। लेकिन मनुष्यता और जीवन के प्रति उसके आस्था कम नहीं होती। विष्णु प्रभाकर के साहित्य का मूल स्वर मनुष्य की पहचान और हर प्रकार के शोषण से मुक्ति है। उनकी चिंता ही मनुष्य और उसके संबंधों की है।
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Pages:50-52
How to cite this article:
डॉ. अनीता यादव "विष्णु प्रभाकर के नाटकों में मानवतावादी स्वर". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 2, 2023, Pages 50-52
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