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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
धर्म, परंपरा एवं लोक-द्वंद्व (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में)
Authors
डॉ0 प्रेरणा पाण्डेय
Abstract
हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का समूचा बौद्धिक विचार-विमर्ष आधुनिक मूल्य-बोध की अवधारणा पर आश्रित है। यह दृष्टि अगर सामाजिक है, तो वे सामाजिकता के आधुनिक आयामों को समक्ष रखते हैं, अगर सांस्कृतिक है तो संस्कृति की प्राचीनतम से लेकर नवीनतम परिस्थितियों, बनने-बिगड़ने और प्रक्रिया में रहने की स्थिति को आधुनिक चेतना-षक्ति से व्याख्यायित करते हैं। जब द्विवेदी जी धर्म पर बात करते हैं तो धर्म की प्राचीन व्याख्या से सहमति-असहमति दर्षाते हुए उसके सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्षों की कठिनाईयों को बेबाकी से कहते हैं। शास्त्रों के कथन से लोक के व्यवहार का कब और कैसे मतभेद हो जाता है, इसे लोक-व्यवहार की सूक्ष्मतम दरारों से देखते हुए द्विवेदी जी सबके समक्ष उजागर कर देते हैं। धर्म की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए वें अन्त में मनुष्यता को भी धारण करने योग्य धर्म बताते हैं। प्रकृति ही एक मात्र स्थिर तत्व है, जिसके कारण मनुष्य को मनुष्यवत् व्यवहार करना चाहिए।
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Pages:63-64
How to cite this article:
डॉ0 प्रेरणा पाण्डेय
"धर्म, परंपरा एवं लोक-द्वंद्व (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में)". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 63-64
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