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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
वर्तमान युग में कबीर की प्रासंगिकता
Authors
सुरेन्द्र कुमार
Abstract
कबीर दास हिंदी के महँ कवियों में से एक है। उत्तर भारत की हिंदी भाषी जनता में तुलसीदास के बाद यदि किसी अन्य कवि का काव्य लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है तो वह कबीर ही हैं। उनकी साखियां, उनके पद लोगों को कंठस्थ हैं। उनकी लोकप्रियता का मूल कारण उनका स्वानुभूत काव्य व अभिव्यक्ति का खरापन है। उन्हें जो समाज के लिए अच्छा लगा उसका खुलकर समर्थन किया और जो उन्हें बुरा लगा उसका विरोध उन्होंने निर्भीकता से किया। उनका यही स्वाभाव लोगों को पसंद आया। कबीर युग दृष्टा कवि थे। उनका व्यक्तित्व, उनकी वाणी युगीन परिस्थितियों की देन है। कबीर ने अपने वर्तमान को ही नहीं भोगा बल्कि भविष्य की चिरंतर समस्याओं को भी पहचाना। कबीर का समाज जात-पांत, छुआछूत, धार्मिक पाखंड, मिथ्याडंबरों, रुढ़ियों, अंधविष्वासों, हिन्दू-मुस्लिम वैमनष्य, शोषण उत्पीड़न आदि से त्रस्त तथा पथभ्रष्ट था। समाज के इस पतन में धर्म, धर्मशास्त्रों तथा धर्म के ठेकेदारों की अहम भूमिका थी। कबीर ने समय की नस को पहचाना। समाज के मार्गदर्शन हेतु एक बड़े संघर्ष एवं परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की। तत्कालीन विकृतियों और विसंगतियों के खिलाफ लड़ने की अथक दृढ़ता एवं सत्य की साधना का अदम्य साहस उन्हें जीवनानुभवों से मिला। उन्होंने जिन सामाजिक, सांस्कृतिक विषमताओं के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया, वे आज भी यथावत हैं। कबीरदास का वैचारिक आंदोलन आज भी वर्ग विहीन समाज के निर्माण, मानवता की बहाली, प्रेम, हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द, आडंबरहीन भक्ति तथा नैतिकता के निर्माण के लिए नितांत प्रासंगिक है।
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Pages:28-31
How to cite this article:
सुरेन्द्र कुमार "वर्तमान युग में कबीर की प्रासंगिकता". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 28-31
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