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VOL. 9, ISSUE 5 (2023)
प्रकृति से परे उठती जीवन की उपलब्धिः महादेवी वर्मा जी के ’रश्मि’ काव्य में ’जीवन’ कविता
Authors
कल्पना वर्मा
Abstract
26 मार्च, 1907 को फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में एक ऐसे अंतर्मुखी व्यक्तित्व का जन्म हुआ। जिनके विचारों में समाज सुधार, नारी स्वतंत्रता पर दृढ़ता, सामंजस्य व आध्यात्म के गुढ़ रहस्य को सदैव देखा गया है। वे जागरूक प्रतिभा की धनी, दया व ममता की प्रतिमूर्ति बन मानव का प्रकृति से रहस्य रूप में जो संबंध मिलता हैं, उनका आपस में सामंजस्य बैठा अपने काव्य को सर्जनात्मक रूप देती रही। छायावादी काव्य को जहां प्रसाद ने प्रकृति तत्व दिया, निराला ने उसमें मुक्त छंद की अवधारणा की ओर पंत ने उसे सुकून सुकोमल कला प्रदान की। वहीं छायावाद के कलेवर में प्राण प्रतिष्ठा करने का गौरव महादेवी जी को ही प्राप्त हैं। भाव अनुभूति की गहराई उनके काव्य में अधिक मिलती हैं। रश्मि काव्य में उन्होंने भारतीय दर्शन को वेदना की हार्दिक स्वीकृति दी। महादेवी जी अपने साहित्य की प्रेरणा से काव्य अनुरागयों को आकर्षित करती रहीं। धार्मिक भाव प्रबल होने के कारण भी आध्यात्मिक व मानवतावादी भाव उनके काव्य से होकर गुजरते हैं। त्याग, सेवा और समर्पण ही महादेवी जी के जीवन उदाहरण से स्पष्ट होता हैं। महादेवी जी ने स्वयं कहा,
ष्अमरता है जीवन का हास,
मृत्यु जीवन का चरम विकास।ष् (29)
रश्मि काव्य की ष्जीवनष् कविता में चीर जीवन इच्छा को मिथ्या तथा मानव प्रगति व परिवर्तन को केवल मृत्यु ही पूर्ण कर सकती हैं। मनुष्य असीम सौंदर्य और अनंत काल तक फैले वैभव का प्राणी हैं। अनंत आकाश, प्रचण्ड जलाने वाली अग्नि, मृदुल और शीतलता प्रदान करने वाला जल, समस्त दिशाओं में सौरभ फैलाने वाली हवा, असंख्य जीवन उत्पन्न करने वाली धरा जिस पर मानव का निर्माण हुआ हैं, इन सब को भी मिटना ही पड़ता हैं, क्योंकि विकास पथ मृत्यु से ही होकर जाता हैं। यही परिवर्तन का सार अलक्ष्य रूप से उसे लक्ष्य तथा पूर्णता की ओर ले चलता हैं।
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Pages:16-18
How to cite this article:
कल्पना वर्मा "प्रकृति से परे उठती जीवन की उपलब्धिः महादेवी वर्मा जी के ’रश्मि’ काव्य में ’जीवन’ कविता". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 5, 2023, Pages 16-18
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