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VOL. 10, ISSUE 2 (2024)
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के प्रतिमान
Authors
कंवराज राम
Abstract
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी आलोचना के वह शिखर पुरूष हैं जिन्होंने हिन्दी आलोचना को सर्वप्रथम एक मौलिक एवं सैद्धान्तिक स्वरूप प्रदान किया। शुक्ल जी ने हिंदी आलोचना के अव्यवस्थित स्वरूप एवं गुण, दोष निरूपण पद्धति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जांचा परखा और हिन्दी आलोचना को प्रौढ़ता प्रदान की। शुक्ल जी ने अपनी आलोचना में जीवन की अनुभूति के साथ-साथ साहित्य के विभिन्न शास्त्रों का अभ्यास किया। उन्होंने साहित्यिक आलोचना के क्रम में भारतीय एवं पाश्चात्य चिन्तन पद्धतियों से भारतीय जीवन मूल्यों को विश्लेषित किया। शुक्ल जी ने साहित्य, कला, एवं काव्य के सैद्धान्तिक विवेचन में शास्त्रीय एवं स्वतन्त्र विचारों पर विशेष ध्यान दिया। प्रथम बार शुक्ल जी ने प्रकृति के सौन्दर्य पर साहित्यिक दृष्टिकोण से विचार किया। उन्होंने साहित्य में रस के महत्व को विवेकपूर्ण ढंग से स्थापित किया तथा बताया कि ‘हृदय की मुक्तावस्था ही रस दशा‘ है। साहित्य में लोक मंगल की भावना शुक्ल जी को बहुत प्रिय थी। इसीलिए वह काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था की बड़ी रोचक एवं नवीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। साधारणीकरण पर मौलिक ढंग से विचार करते हुए शुक्ल जी पंडितराज जगन्ननाथ के सिद्धान्त पर नवीन उद्भावना प्रस्तुत करते हैं। काव्य का विवेचन करते हुए वह मानते हैं कि ‘सच्चा कवि वही है जिसको लोक हृदय की पहचान‘ है। ‘रहस्यवाद‘ पर विचार करते हुए शुक्ल जी ने ‘छायावाद‘ को उसी आलोक में देखने की कोशिश की तथा उसका संबंध काव्य वस्तु से जोड़ते हुए अतृप्ति काम भावना, प्रेम एवं वासना आदि भावों की व्यंजना का माध्यम माना। शुक्ल जी अपनी सैद्धान्तिक आलोचना के क्रम में काव्य के शिल्प पर विशेष ध्यान देते हैं। वह काव्य की भाषा के अर्थ विधान, अलंकार के स्वरूप एवं प्रयोजन तथा छन्द विधान के महत्व पर बल देते हैं।
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Pages:28-30
How to cite this article:
कंवराज राम "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के प्रतिमान". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 2, 2024, Pages 28-30
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