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VOL. 10, ISSUE 3 (2024)
प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ में सामाजिक विवशता की अभिव्यक्ति
Authors
जितेन्द्र कुमार मीणा
Abstract
स्त्री और पुरुष को सृष्टि का आधार स्तम्भ मानते हुए। समाज ने इनको दो लिंगों की मान्यता दी है। लेकिन जिस सृष्टि की उपज का परिणाम स्त्री और पुरुष है। वही उसको स्वीकार नहीं करते समाज का अंग मानने से इंकार करते है और उसकी उपेक्षा भी करते है वो है ‘थर्ड जेंडर’। लेकिन अपने स्वार्थ हित अनुसार तथाकथित सभ्य समाज के लोग इनका इस्तेमाल करते है। किन्नर समाज की व्यथा का चित्रण गहन संवेदना से किया है जो पाठक को बांधे रखता है। प्रदीप सौरभ ने बहुत ही साहस और हिम्मत के साथ तीसरी दुनिया के लोगों की समस्या से जुड़े तथ्यों को उजागर किया है। सभ्यता के विकास के साथ मानव कि सोच में बदलाव हुआ लेकिन कुछ मान्यताएं नहीं बदल पायी इनमे से है ‘थर्ड जेंडर’ के प्रति समाज का नज़रियाँ। जिससे उनकी विवशता बढ़ती ही जाती है।
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Pages:20-22
How to cite this article:
जितेन्द्र कुमार मीणा "प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ में सामाजिक विवशता की अभिव्यक्ति". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 3, 2024, Pages 20-22
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