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VOL. 11, ISSUE 1 (2025)
वेदांत दर्शन में निहित ‘अद्वैतवाद ’ की अवधारणा और उसका हिंदी कविता पर प्रभाव
Authors
डा नाज़िश बेगम
Abstract
यह शोध-पत्र वेदांत दर्शन की प्रमुख शाखा ‘अद्वैतवाद’ की अवधारणा और इसका हिंदी कविता पर पड़ने वाले प्रभाव की समन्वित रूप से विवेचना करता है। आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धांत — "ब्रह्म सत्यम्, जगन्मिथ्या" — न केवल दार्शनिक विमर्श का केंद्र बना, अपितु उसकी छाया मध्यकालीन हिंदी भक्ति काव्य और आधुनिक साहित्य पर भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। शोधकर्ता ने अद्वैत के गूढ़ तत्वों को कबीर, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और अज्ञेय जैसे कवियों के काव्य में खोजा है, जिनमें ब्रह्म-जीव की एकता, माया का स्वभाव, आत्म साक्षात्कार और मुक्तिपथ जैसे विचार कला की सूक्ष्म भाषा में रूपायित होते हैं। शास्त्र-काव्य की परंपरा को उद्घाटित करते हुए यह लेख दर्शन और सौंदर्य बोध के अंतःसंबंध को रेखांकित करता है। साथ ही, यह रचना मानवीय चेतना, आध्यात्मिकता और कविता के माध्यम से आत्मानुभूति के स्थायी प्रश्नों पर विचार करती है, जिससे हिंदी कविता को एक व्यापक दार्शनिक आधार प्राप्त होता है।
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Pages:97-102
How to cite this article:
डा नाज़िश बेगम "वेदांत दर्शन में निहित ‘अद्वैतवाद ’ की अवधारणा और उसका हिंदी कविता पर प्रभाव ". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 1, 2025, Pages 97-102
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