ARCHIVES
VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
बोकार समाज और उसकी लोक मान्यताएँ
Authors
डॉ. पासांग रुकू
Abstract
मनुष्य अपने कार्य की सिद्धि अथवा असिद्धि का संबंध किसी विशेष कार्य-व्यापार से जोड़ता है और इसी संबंध को शकुन-अपशकुन के रूप में माना गया है। भारतीय विद्वान डॉ. सतेन्द्र ने लोकविश्वास के संदर्भ में कहा है कि- ‘लोकधर्म और लोकविश्वास परस्पर घनिष्ठ रूप से संबंधित है। प्रत्येक प्रकार के लोकविश्वासों का संग्रह करना अपेक्षित है। ये विश्वास प्रत्येक क्षेत्र में प्रचलित है। उन्हें अभिप्राय- अनुक्रमणिका (मोटीफ इंडेक्स) के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता है।’ लोक अनुभवों से से अर्जित स्थापनाओं या परिणामों के लोकमान्य होने से जो लोकविश्वास हर युग में बनते हैं, उनका संबंध तत्कालीन विशिष्ट परिस्थितियों से रहता है और जब वैसी ही परिस्थितियाँ आती हैं तब उसे लोकसिद्ध विश्वास के रूप में मानते हैं।
लोकमान्यताएँ बोकार लोकजीवन में ही नहीं बल्कि विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में विविध रूप में प्रचलित है। लोकजीवन के विश्वास वहाँ के धर्म पर आधारित होते हैं। बोकार समुदाय में लोक मान्यताएँ, विश्वास, शकुन-अपशकुन, पुनर्जन्म, भूत-प्रेत, देवई-देवता एवं उनकी पूजा पद्धति आदि का उल्लेख देखने को मिलता है। जैसे कि बोकार जनजाति की मान्यताओं के अनुसार घर में साँप का घुस जाना, कुत्ते का रोना, सूअर का चिचियाना, चूहों का रोना और उल्लू का बोलना आदि अशुभ माना जाता है।
इस शोध पत्र में अरुणाचल के बोकर समुदाय के लोकजीवन तथा उनकी लोकमान्यताओं का विस्तृत विश्लेषण एवं विवेचना किया जाएगा।
Download
Pages:9-12
How to cite this article:
डॉ. पासांग रुकू "बोकार समाज और उसकी लोक मान्यताएँ". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 9-12
Pdf, Certificate, Cover Page, Index Page, Editorial Page, Accept Letter
Please enter the email address corresponding to this article submission.

