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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में रस विषयक औचित्य विधान (शृंगार, करुण, शान्त और वात्सल्य रस के विशेष संदर्भ में)
Authors
पुष्पेंद्र पाठक
Abstract
काव्य के सभी अंगो में परस्पर अनुरूपता और उस अनुरूपता से जन्म लेने वाला समन्वय आचार्य क्षेमेन्द्र द्वारा प्रतिपादित औचित्य सिद्धान्त का मूल तत्व है। ‘रस’ काव्य का एक महत्वपूर्ण अंग है और आचार्य विश्वनाथ के अनुसार तो काव्य की आत्मा है। किन्तु ‘रस’ से भी काव्य के अन्य अंगों के प्रति अनुरूपता अपेक्षित होती है जो कि उसे औचित्य की परिधि में ले आती है। औचित्य के होने पर रस उचित रूप से साधारणीकृत होता है और आनंदानुभूति कराने में सक्षम हो जाता है।
औचित्य और रस के इसी परस्पर संबंध को आचार्य क्षेमेन्द्र ‘रसौचित्य’ का नाम देते हैं। गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में सभी रसों का विराट समन्वय है और लोक में उनके काव्य की स्वीकार्यता इस समन्वय में औचित्य की पुष्टि का प्रमाण है। तुलसीदास के काव्य में यूं तो सभी नौ रस बहुतायात में प्रयुक्त होते दिखाई पड़ते हैं किन्तु प्रस्तुत शोध पत्र में उनके काव्य में लक्षित होने वाले शृंगार, करुण, शान्त और वात्सल्य रस के संबंध में रसौचित्य का अनुसंधान अभीष्ट है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के काव्य का अनुशीलन करने पर ऐसा ज्ञात होता है कि अपने काव्य में रसों की अभिव्यक्ति के संबंध में वे रसौचित्य के सभी पक्षों से सुविज्ञ थे।
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Pages:27-29
How to cite this article:
पुष्पेंद्र पाठक "गोस्वामी तुलसीदास के काव्य में रस विषयक औचित्य विधान (शृंगार, करुण, शान्त और वात्सल्य रस के विशेष संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 27-29
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