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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
मध्यकाल की दो भीतरी ताकत : कबीर एवं तुलसी
Authors
सुकर्मवती देवी
Abstract
आध्यात्मिक धरातल पर रचित मध्ययुगीन काव्य भारतीय संस्कृति
का पुष्टपोषक एवं संवाहक है। यह साहित्य मानव मूल्यों की उच्च पृष्ठभूमि तैयार कर जन
- जीवन को जीने की नई प्रेरणा प्रदान करता है। नई चेतना को ऊर्जस्वित कर आडंबरवाद का
खंडन करता है। घोर सामंतवाद की मानसिकता में उपजा ये साहित्य मानव जाति को संकीर्ण
घेरे से निकालकर प्रगतिशील विचारों से समन्वित करना चाहता है। कबीर और तुलसी दोनों
ही इस युग की उपज थे, उन्होंने अपनी - अपनी विचारधारा से समाज को मुक्ति दिलाने का
महान कार्य किया। सांप्रदायिक दृष्टि से धर्म के विभेद को दूर कर मनुष्य - मनुष्य के
बीच की दूरी को खत्म करने का बीड़ा उठाया। तुलसी की दृष्टि लोकमंगल की है, वे अपनी
रचनाओं में उच्चतम भावभूमि और जीवन के सैद्धांतिक
उच्चादर्शों की प्रतिष्ठा करते हैं । दूसरी और कबीर भी संयमित तरीके से समाज को अनाचारों
की दलदल से निकालकर प्रवंचना रहित आत्मानुभूति का बोध कराना चाहते थे। समाज हित में
दोनों का योगदान आज भी प्रासंगिक है।
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Pages:81-83
How to cite this article:
सुकर्मवती देवी "मध्यकाल की दो भीतरी ताकत : कबीर एवं तुलसी". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 81-83
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