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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
हिंदी साहित्य में मानवतावाद का विकास
Authors
विनोद कुमार
Abstract
हिंदी साहित्य में मानवतावाद मानव गरिमा, समानता, तर्क और सामाजिक न्याय पर आधारित एक चिंतन धारा है, जो पाश्चात्य पुनर्जागरण-ज्ञानोदय तथा भारतीय वैदिक-उपनिषदिक चिंतन से प्रेरित है। आदिकाल में वीरगाथाओं के लोक-जीवन चित्रण से बीज अंकुरित हुए, जबकि भक्तिकाल में निर्गुण, सगुण काव्य ने चरम अभिव्यक्ति दी। रीतिकाल में दरबारी श्रृंगारिकता के बीच भूषण की राष्ट्रीय चेतना ने क्षीण स्वर बुलंद किया। आधुनिक काल में भारतेंदु युग ने राष्ट्रीय जागरण से, द्विवेदी युग ने नैतिक उपयोगितावाद से, छायावाद एवं प्रगतिवाद से इसे पुनर्जागृत किया। उपन्यास-कहानियों में प्रेमचंद का यथार्थवाद, जैनेंद्र का मनोविश्लेषण, यशपाल-रांगेय का वर्ग-संघर्ष तथा कृष्णा सोबती- मनू भंडारी का स्त्री-विमर्श मानवतावाद को बहुआयामी बनाते हैं।
इस आलेख में हिंदी साहित्य में मानवतावाद का विकास जो हिंदी साहित्य के उद्भव से लेकर आधुनिक साहित्य तक विभिन्न काल खंडों में किस प्रकार हुआ है को प्रस्तुत किया गया हैं।
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Pages:107-112
How to cite this article:
विनोद कुमार
"हिंदी साहित्य में मानवतावाद का विकास". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 107-112
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