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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
हिंदी उपन्यासों में जादुई यथार्थवाद और यथार्थ का विकेंद्रीकरण
Authors
डॉ. मणि रंजन राय, डॉ. अंकिता त्रिपाठी
Abstract
हिन्दी उपन्यासों में यथार्थवाद और जादुई यथार्थवाद ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अनुभवों को समग्र रूप में प्रस्तुत किया है। पश्चिमी यथार्थवाद तथ्यात्मक वास्तविकता तक सीमित है, जादुई यथार्थवादी परिचय ने रचनात्मकता के नवीन आयाम खोल दिए। इसी परिचय का उपयोग करके भारतीय उपन्यासकार मिथक, लोककथा और जादुई तत्त्वों के माध्यम से अनुभव और स्मृतियों को भी यथार्थ में सम्मिलित करते हैं। खिलेगा तो देखेंगे, परछाईं नाच, गायब होता देश और रेत - समाधि सरीखे उपन्यास जीवन, स्मृतियों और जादुई यथार्थवाद के मध्य गतिशीलता की खोज है, जिसमें पात्र, प्रतीक और मिथक सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संघर्षों को जटिल रूप से दर्शाते हैं। ये सभी उपन्यास पाठक को अपने अनुभव और कल्पना से रिक्त स्थान भरने की स्वतंत्रता देते हैं।
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Pages:15-17
How to cite this article:
डॉ. मणि रंजन राय, डॉ. अंकिता त्रिपाठी "हिंदी उपन्यासों में जादुई यथार्थवाद और यथार्थ का विकेंद्रीकरण". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 15-17
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