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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
समसामयिक दलित उपन्यास एवं दलित कविताएँ
Authors
हंसराज, डॉ. अशोक धारनिया
Abstract
हिंदी दलित साहित्य की विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त सामाजिक यथार्थ, अस्मिता-बोध और प्रतिरोध चेतना का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। समकालीन दलित उपन्यास जातिगत शोषण, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक विषमता तथा शिक्षा और पहचान के संघर्ष को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में चित्रित करते हैं। उदाहरण स्वरूप ’’छप्पर’’ जैसे उपन्यास ग्रामीण जीवन की कठोर वास्तविकताओं और परिवर्तन की आकांक्षा को उभारते हैं। दलित कविताएँ तीखे और स्पष्ट स्वर में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती हैं। इन पर ’’नामदेव ढसाल’’ की विद्रोही काव्य-परंपरा का प्रभाव देखा जा सकता है। समकालीन दलित काव्य में आत्मगौरव, समानता और सामाजिक न्याय का आग्रह प्रमुख है। समग्रतः ये रचनाएँ साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम सिद्ध करती हैं।
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Pages:171-172
How to cite this article:
हंसराज, डॉ. अशोक धारनिया "समसामयिक दलित उपन्यास एवं दलित कविताएँ". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 171-172
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