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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
स्त्री लेखन परम्परा एवं मनीषा कुलश्रेष्ठ : कथा साहित्य के सन्दर्भ में
Authors
हिमांशु नागदा, डॉ विजयलक्ष्मी पोद्दार
Abstract
यह शोधपत्र हिंदी साहित्य में स्त्री साहित्यकारों के ऐतिहासिक विकास, वैचारिक विस्तार और रचनात्मक रूपांतरण का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री लेखन की परंपरा नवजागरण या आधुनिक काल से प्रारंभ नहीं हुई है। इसकी जड़ें वैदिक ऋषिकाओं, बौद्ध थेरीगाथा और मध्यकालीन स्त्री-भक्ति परंपरा से जुड़ी हैं। आधुनिक गद्य के विकास के साथ स्त्री लेखन ने कहानी और उपन्यास के माध्यम से सामाजिक यथार्थ, एवं स्त्री-अस्मिता को केंद्र में रखा। स्वाधीनता-पूर्व लेखिकाओं ने सुधारवादी दृष्टि से स्त्री की सक्रिय भूमिका को रेखांकित किया, जबकि स्वाधीन भारत के समकालीन दौर में स्त्री लेखन अधिक आत्मबोध, मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक आलोचना से जुड़ा। हालांकि इस क्रम में महादेवी वर्मा ने स्त्री विमर्श को सैद्धांतिक एवं परिपक्व आधार प्रदान किया तथा समकालीन स्त्री रचनाकारों ने अपने कथा साहित्य से स्त्री अनुभवों को व्यापक स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में व्यक्त किया। इक्कीसवीं सदी में मनीषा कुलश्रेष्ठ का लेखन स्त्री को स्मृति, गरिमा और पुनर्निर्माण की चेतना से युक्त एक सक्रिय सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। शोधपत्र यह स्थापित करता है कि हिंदी स्त्री लेखन केवल प्रतिरोध का साहित्य नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पुनर्संरचना की सशक्त परंपरा है।
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Pages:1-4
How to cite this article:
हिमांशु नागदा, डॉ विजयलक्ष्मी पोद्दार "स्त्री लेखन परम्परा एवं मनीषा कुलश्रेष्ठ : कथा साहित्य के सन्दर्भ में". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 1-4
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