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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
मध्यकालीन भारतीय समाज में नारी : स्थिति, संघर्ष और योगदान
Authors
डॉ. कल्पना थपलियाल
Abstract
प्रस्तुत अध्ययन भारतीय इतिहास में महिलाओं की भूमिका का समग्र विश्लेषण करता है, विशेषतः मध्यकालीन संदर्भ में। प्राचीन वैदिक युग में जहाँ नारी को शिक्षा, धर्म, साहित्य और सामाजिक निर्णयों में सक्रिय सहभागिता प्राप्त थी, वहीं मध्यकाल में राजनीतिक अस्थिरता, आक्रमणों, केंद्रीकृत सत्ता के अभाव और पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के सुदृढ़ होने से महिलाओं की स्थिति में उल्लेखनीय गिरावट आई। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती, बहुविवाह तथा शिक्षा से वंचना जैसी सामाजिक कुरीतियों ने नारी के सार्वजनिक, बौद्धिक और राजनीतिक जीवन को सीमित कर दिया। इसके बावजूद यह काल पूर्णतः नारी निष्क्रियता का नहीं था। जहाँआरा, जेबुन्निसा, नूरजहाँ, रजिया सुल्तान, मीराबाई, अक्का महादेवी, रानी दुर्गावती, चांद बीबी, अब्बक्का चौटा और रानी पद्मिनी जैसी स्त्रियों ने प्रशासन, भक्ति आंदोलन, साहित्य और युद्ध के क्षेत्र में अपनी असाधारण प्रतिभा, साहस और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मध्यकालीन प्रतिबंधों के बावजूद भारतीय महिलाओं ने सामाजिक संरचनाओं को चुनौती दी और अपने योगदान से इतिहास को समृद्ध किया। अतः भारतीय इतिहास में नारी की भूमिका संघर्ष, सृजन और सशक्तिकरण की निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखी जा सकती है।
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Pages:50-52
How to cite this article:
डॉ. कल्पना थपलियाल "मध्यकालीन भारतीय समाज में नारी : स्थिति, संघर्ष और योगदान". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 50-52
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