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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
परंपरा एवं आधुनिकता के संधिकाल में संन्यास: काशी की रामानंदी वैष्णव परंपरा पर समाजशास्त्रीय दृष्टि
Authors
विशाल प्रताप मित्र
Abstract
प्रस्तुत लेख काशी में विद्यमान रामानंदी वैष्णव परंपरा के अंतर्गत संन्यासी जीवन के बदलते स्वरूप का विश्लेषण का प्रयत्न है जो उसे लोकधर्म, शहरी परिवर्तन एवं समकालीन धार्मिक अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों में स्थित करता है। ऐतिहासिक रूप से रामानंदी संन्यास परंपरा नैतिक अनुशासन, समावेशन के साथ-साथ जनभाषा आधारित भक्ति पर टिका रहा है जहाँ साधु लोकजीवन से जुड़े रहते हुए धार्मिक मार्गदर्शन की भूमिका निभाते थे लेकिन काशी में तीव्र शहरीकरण, धार्मिक पर्यटन के विस्तार तथा पवित्र स्थलों के बाज़ारीकरण ने इस परंपरा के भीतर नए प्रकार के तनाव एवं अनुकूलन की स्थितियाँ उत्पन्न की हैं। समाजशास्त्रीय सिद्धांतों यथा संन्यास की नैतिक सत्ता, परंपरा-आधुनिकता के अंतर्संबंध तथा सांस्कृतिक स्मृति आदि के आलोक में यह अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामानंदी साधु किस प्रकार तपस्या, धार्मिकता, लोकधर्म एवं संस्थागत संरचना तथा आध्यात्मिक प्रामाणिकता और बाज़ार-तर्क के बीच संतुलन साधते हैं। द्वितीयक साहित्य के विश्लेषण के साथ-साथ काशी पर केंद्रित समकालीन क्षेत्रीय समाजशास्त्रीय अध्ययनों के आधार पर यह लेख घाटों, अनुष्ठानों एवं सार्वजनिक धार्मिक प्रदर्शनों को सांस्कृतिक स्मृति के ऐसे स्थलों के रूप में देखता है जहाँ परंपरा निरंतर वर्तमान में पुनरुत्पादित होती रहती है। इस आलेख का निष्कर्ष यह दर्शाता है कि ये परिवर्तन संन्यास के क्षय का संकेत नहीं हैं अपितु एक ऐसी चयनात्मक अनुकूलन प्रक्रिया को प्रकट करते हैं जिसके माध्यम से रामानंदी परंपरा अपनी ऐतिहासिक निरंतरता बनाए रखते हुए शहरी धार्मिक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों का सामना करती है। इस प्रकार लेख संन्यास को सामाजिक जीवन से पलायन की बजाए बदलते शहरी संदर्भों में पुनर्परिभाषित होती एक जीवंत सामाजिक-नैतिक प्रथा के रूप में पुनर्विचार करने का प्रस्ताव रखता है।
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Pages:55-59
How to cite this article:
विशाल प्रताप मित्र "परंपरा एवं आधुनिकता के संधिकाल में संन्यास: काशी की रामानंदी वैष्णव परंपरा पर समाजशास्त्रीय दृष्टि". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 55-59
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