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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
डॉ0 ईश्वर चंद ‘गंभीर’ के काव्य में पर्यावरण चिंतन
Authors
दीपा त्यागी
Abstract
‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय गीत में वर्णित शस्य श्यामल, सुस्वादिष्ट फल, शीतल जल, खिले हुए पुष्प, लताओं से सुशोभित, हरी-भरी वनस्पति वाली धरती माँ सभी को सुख समृद्धि का वरदान देने वाली है पर आज का कवि कहता है कि ‘‘धरती की ओजोन में पड़ने लगी दरार’’ ‘‘प्रकृति रक्षा धर्म हमारा/शुद्ध पर्यावरण हमारा नारा।’’ हमारा पोषण करने वाली धरा को आज हम क्या दे रहे हैं? बाग काटकर आवास बना रहे हैं, पक्षियों से उनके आवास छीन रहे हैं। वृक्षों के कटान, अशुद्ध जल, दूषित पवन ऐसे विषाक्त वातावरण में जिंदगी कैसे मुस्करा सकती है? मनुष्य की साँसों पर पहरा है। पर्यावारण चिंतक, प्रकृति प्रेमी कवि गंभीर का कहना है कि साँस कम, हो रही घुटन अब प्रदूषण अखरने लगा। सम सामयिक समस्याओं के प्रति सजग कवि जनता का आह्वान करता है कि पर्यावरण शुद्ध रखने के लिए पेड़ लगाने होंगे, नाले, नाली, ताल-तलैया सभी को स्वच्छ रखना होगा। वैसे भी वातावरण शुद्ध होगा तो जिंदगी भी मुस्करायेगी इसलिए हमें जल के क्षय को रोकना है और शुद्ध भी रखना है। संकल्प लेना होगा कि रोगविनाशिनी गंगा को कूड़ा-कर्कट, पॉलिथीन, पन्नी, कैमिकल लगी मूर्तियों बहाकर विषैली नहीं बनायेंगे। साथ ही पर्यावरण शुद्ध रखने के लिए जनसंख्या नियन्त्रण भी अति आवश्यक है क्योंकि आबादी कम होगी तो सीमित संसाधनों की आवश्यकता होगी अन्यथा न तो कृषि योग्य भूमि बचेगी और न ही सभी को शुद्ध जल एवं वायु प्राप्त होगी। आवास की समस्या कृषि भूमि एवं जंगलों को उजाड़ रही है, परिणामस्वरूप प्रदूषण युक्त पर्यावरण मानव जीवन के लिए काल बनकर खड़ा है। कवि कह उठता है-‘‘शुद्ध करो पर्यावरण, कब चेतोगे यार।’’
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Pages:138-141
How to cite this article:
दीपा त्यागी
"डॉ0 ईश्वर चंद ‘गंभीर’ के काव्य में पर्यावरण चिंतन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 138-141
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