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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
छात्राध्यापकों के शिक्षण विषयों के परिप्रेक्ष्य में संवेगात्मक बुद्धि, समायोजन का अध्ययन
Authors
अवनीश कुमार
Abstract
समाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षक की भूमिका केंद्रीय और निर्णायक होती है। शिक्षक केवल पाठ्यविषय का अध्यापन करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह ज्ञान, संस्कृति, नैतिक मूल्यों और आधुनिक कौशलों को एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुँचाने वाला सेतु होता है। शिक्षक के जरिया से ही समाज की बौद्धिक चेतना जीवित रहती है और राष्ट्र की वैचारिक दिशा निर्धारित होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप कहा जा सकता है कि शिक्षक सभ्यता की लौ को निरंतर प्रज्ज्वलित रखने वाला मार्गदर्शक होता है। वस्तुतः शिक्षक के अभाव में शिक्षण संस्थान केवल ईंट-पत्थर की संरचना बनकर रह जाते हैं।
मनुष्य अन्य प्राणियों से इस कारण भिन्न है कि वह पूर्ववर्ती पीढ़ियों द्वारा अर्जित ज्ञान को समझने, अपनाने और आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है। ज्ञान के विकास की पद्धति को तीन मुख्य चरणों में समझा जा सकता हैकृज्ञान का संचय, उसका प्रभावी प्रसारण तथा उसमें सतत वृद्धि। ये तीनों ही आयाम शिक्षण की पद्धति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। शिक्षण में शिक्षक और छात्र दोनों सक्रिय सहभागी होते हैं, जिससे यह पद्धति जीवंत और सृजनात्मक बन जाती है। शिक्षण की प्रभावशीलता केवल पाठ्यक्रम या शिक्षण विधियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि शिक्षक के व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और आचरण में निहित होती है।
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Pages:129-134
How to cite this article:
अवनीश कुमार "छात्राध्यापकों के शिक्षण विषयों के परिप्रेक्ष्य में संवेगात्मक बुद्धि, समायोजन का अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 129-134
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