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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
व्यक्तिव विकास में प्राणायाम की भूमिकाः वर्णनात्मक शोध अध्ययन
Authors
सूरज सिंह, डॉ भावना देथा
Abstract
योग प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मानवीय धर्म, सदाचार व आध्यात्मिकता के रुप में प्रतिष्ठत है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। युग निर्माण का आधार व्यक्तित्व निर्माण के लिए आवश्यक है, क्लिष्ट वृत्तियों के निरोध करें। प्राणायामों में प्राण के निरोध से मनः का संयम है, और यहाँ मनः और इन्द्रियों के संयम से प्राणों का संयम होता है। उस प्राणायाम के सिद्ध होने पर विवेकज्ञान को आवृत्त करने वाले पाप और अज्ञान का क्षय हो जाता है। प्राणायाम की सिद्धि से मनः स्थिर होकर उसकी धारणाओं के योग्य सामर्थ्य हो जाता है। प्राणिक ऊर्जा का संरक्षण कर असंयमित जीवनी शक्ति को संरक्षित किया जा सकता है।
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Pages:201-203
How to cite this article:
सूरज सिंह, डॉ भावना देथा "व्यक्तिव विकास में प्राणायाम की भूमिकाः वर्णनात्मक शोध अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 201-203
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