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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
अभागी का स्वर्ग और सती में शरतचन्द्र की नारी-दृष्टि
Authors
डॉ. पारोमिता दास
Abstract
‘अभागी का स्वर्ग’ और ‘सती’ दोनों कहानियाँ दिखाती हैं कि शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय स्त्री के जीवन को गहरी मानवता और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। अभागी जन्म से ही अभाव, परित्याग और अपमान से घिरी है, फिर भी अपने मौन त्याग, मातृत्व और गरिमा से एक असाधारण ऊँचाई तक पहुँचती है; उसकी पीड़ा को समाज साधारण समझकर अनदेखा कर देता है। दूसरी ओर “सती” की निर्मला सुशिक्षित और सम्मानित परिवार में रहते हुए भी विवाह-पूर्व मिले उपदेशों, पति-केंद्रित अपेक्षाओं और निरंतर गृहस्थी-भार के कारण उसी पितृसत्तात्मक संरचना का सामना करती है जिसने उसके लिए त्याग को कर्तव्य और स्वयं के जीवन को गौण बना दिया। इन दोनों कथाओं में स्त्री के भीतर का प्रेम त्याग और करुणा के रूप में प्रकट होता है, जो काम से अलग, आत्मा के विस्तार का अनुभव है। अभागी और निर्मला दोनों अपने अपने संसार में संघर्ष, प्रेम और नैतिकता को बिना शोर के जीती हैं। शरतचन्द्र इनके माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि स्त्री को आदर्श या दया की वस्तु नहीं, बल्कि पूर्ण मनुष्य के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसके दुःख, इच्छाएँ और अस्तित्व समान सम्मान के योग्य हैं।
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Pages:242-244
How to cite this article:
डॉ. पारोमिता दास "अभागी का स्वर्ग और सती में शरतचन्द्र की नारी-दृष्टि". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 242-244
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