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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
केदारनाथ ‘शब्द मसीहा‘ के लघुकथा, कहानी और व्यंग्य में अस्मिता परक यथार्थ
Authors
डॉ. योगेश कुमार तारक
Abstract
प्रस्तुत आलेख में ‘अस्मिता परक यथार्थ‘ की अवधारणा को समकालीन सामाजिक और साहित्यिक संदर्भों में स्पष्ट किया गया है। आधुनिक युग में स्वतंत्रता और संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद व्यक्ति की अस्मिता संकटग्रस्त दिखाई देती है। ‘अस्मिता‘ का संबंध ‘निजत्व‘, ‘स्वत्व‘ और ‘मैं हूँ‘ की चेतना से है, जो आत्मसम्मान और पहचान का बोध कराती है। किंतु वर्तमान समाज में व्यक्तिवाद, एकाकीपन और स्वार्थ की प्रवृत्ति के कारण यह चेतना वैमनस्य और संघर्ष का रूप लती जा रही है। साहित्य, जो समाज की चित्तवृत्तियों का प्रतिबिंब है, इस अस्मिता संकट को अभिव्यक्त करते हुए विभिन्न वर्गों-भाषा, धर्म, जाति, लिंग आदि से जुड़े अस्मितामूलक प्रश्नों को सामने लाता है और उनके समाधान की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।
आलेख में विशेष रूप से नारी अस्मिता, दलित अस्मिता और अल्पसंख्यक अस्मिता के संदर्भ में सामाजिक यथार्थ को रेखांकित किया गया है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री को द्वितीय स्थान दिए जाने का विरोध करते हुए नारी अस्मिता को स्वतंत्रता, सम्मान और समानता के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इतिहास और साहित्य में अनेक स्त्रियों ने अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष किया, जिससे नारी चेतना को बल मिला। इसी प्रकार दलित वर्ग भी संवैधानिक अधिकारों के बावजूद सामाजिक शोषण का शिकार है, जिसके प्रतिरोध में साहित्य सशक्त माध्यम बनकर उभरता है। इस प्रकार ‘अस्मिता परक यथार्थ‘ सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होता है।
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Pages:18-21
How to cite this article:
डॉ. योगेश कुमार तारक "केदारनाथ ‘शब्द मसीहा‘ के लघुकथा, कहानी और व्यंग्य में अस्मिता परक यथार्थ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 18-21
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