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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
भक्ति, नैतिक प्रतिरोध और पिंगल छंद: हरियाणवी रागनी परंपरा में ‘किस्सा भगत पूरणमल’ का समालोचनात्मक अध्ययन (रागनी 1–8 के संदर्भ में)
Authors
आनन्द कुमार आशोधिया
Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र में आनन्द कुमार आशोधिया कृत ‘किस्सा भगत पूरणमल’ की रागनी 1–8 का साहित्यिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक तथा पिंगल-छंदात्मक दृष्टियों से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह प्रतिपादित करना है कि पूरणमल की कथा केवल एक पारंपरिक लोक-आख्यान नहीं है, बल्कि यह भक्ति, नैतिक प्रतिरोध, सामाजिक न्याय और आध्यात्मिक पुनर्जन्म की बहुस्तरीय प्रक्रिया को अभिव्यक्त करने वाली एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है। शोध में गुणात्मक एवं व्याख्यात्मक पद्धति अपनाई गई है तथा निकट-पाठन, सांस्कृतिक अध्ययन, प्रतीकात्मक विश्लेषण और पिंगल-आधारित छंद परीक्षण का उपयोग किया गया है।
रागनी 1–3 में पूरणमल के दुःख, परित्याग, कुएँ में गिराए जाने और गुरु-परंपरा के माध्यम से उद्धार का वर्णन है, जो करुणा और आध्यात्मिक जागरण का आधार निर्मित करता है। रागनी 4–5 में भिक्षाटन और लोक-संवाद के माध्यम से पूरणमल एक नैतिक प्रतिरोधी व्यक्तित्व के रूप में उभरता है। रागनी 6–8 में उसका संतत्व स्थापित होता है और वह माया, नश्वरता, नाम-स्मरण तथा लोक-नैतिकता जैसे विषयों पर विचार प्रस्तुत करता है। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि हरियाणवी रागनी परंपरा में छंद-विधान केवल लयात्मकता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भाव और विचार की अभिव्यक्ति का सक्रिय माध्यम है। मात्रा-संतुलन, यति-विन्यास, तुकांत और अनुप्रास का प्रभावी प्रयोग इस कृति को श्रव्य और मंचीय दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।
यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ‘किस्सा भगत पूरणमल’ हरियाणवी लोक-साहित्य में भक्ति और नैतिक प्रतिरोध की एक विशिष्ट धारा का प्रतिनिधित्व करता है तथा समकालीन साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्शों में भी इसकी महत्त्वपूर्ण प्रासंगिकता है।
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Pages:92-94
How to cite this article:
आनन्द कुमार आशोधिया "भक्ति, नैतिक प्रतिरोध और पिंगल छंद: हरियाणवी रागनी परंपरा में ‘किस्सा भगत पूरणमल’ का समालोचनात्मक अध्ययन (रागनी 1–8 के संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 92-94
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