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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
21वीं सदी की आदिवासी हिन्दी कहानियों में बदलता भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य: एक विश्लेषण
Authors
अर्चना मीणा
Abstract
यह शोध-पत्र 21वीं सदी के आदिवासी हिन्दी कथा साहित्य का समग्र और बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य समकालीन आदिवासी कहानियों में उभरते सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को समझना है। वंदना टेटे, रोज केरकेट्टा, जसिन्ता केरकेट्टा, निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर, महादेव टोप्पो तथा अन्य प्रमुख आदिवासी रचनाकारों की कहानियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि आदिवासी साहित्य केवल अनुभव की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सशक्त वैचारिक और प्रतिरोधात्मक विमर्श भी है।
इस शोध में यह पाया गया कि वैश्वीकरण, विकास परियोजनाओं और बाजारीकरण ने आदिवासी समाज की पारंपरिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप विस्थापन, सांस्कृतिक क्षरण और पहचान का संकट उत्पन्न हुआ है। साथ ही, आदिवासी कथा साहित्य इन चुनौतियों के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना भी विकसित करता है। पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और सामुदायिक जीवन-मूल्यों को इन कहानियों में विशेष महत्व दिया गया है, जो आधुनिक विकास मॉडल के लिए एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं।
भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी आदिवासी कहानियां विशिष्ट हैं। इनमें लोकजीवन, मौखिक परंपरा, मिथकों और आदिवासी भाषाओं के तत्वों का समावेश हिन्दी साहित्य को नई समृद्धि प्रदान करता है। निष्कर्षतः, 21वीं सदी का आदिवासी हिन्दी कथा साहित्य न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक विविधता और पर्यावरणीय संतुलन की स्थापना की दिशा में एक प्रभावशाली माध्यम के रूप में भी सामने आता है।
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Pages:99-104
How to cite this article:
अर्चना मीणा "21वीं सदी की आदिवासी हिन्दी कहानियों में बदलता भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य: एक विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 99-104
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