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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
दादू पंथी संत सुंदरदास का काव्य
Authors
हरिराम
Abstract
भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है। भक्ति की पावन धारा में निर्गुण और सगुण कवियों ने अवगाहन कर हिंदी भाषा को कालजयी साहित्य का उपहार दिया है। राजस्थान की भूमि पर निर्गुण भक्ति का बीजवपन करने वाले संतो में संत दादू दयाल अग्रगण्य है। संत दादूदयाल ने कबीर की साधना का अनुसरण करते हुए अपना पंथ स्थापित किया जिसमें रज्जब, जगजीवनदास, गरीबदास ,मिस्कीनदास और सुंदरदास जैसे साधक हुए। सुंदरदास जी की विशेषता इस बात में थी कि वे निर्गुण मार्ग के पहले शास्त्रज्ञान प्राप्त अनुयायी थे। इस कारण जहां दादू दयाल ने मुख्यतः पदों और दोहों में अपनी वाणी कही है वहीं सुंदरदास ने चौपाई, मनहरण कवित्त ,सव्वैया जैसे रीतिकाल के लोकप्रिय छंदों का भी प्रयोग किया है। शास्त्र ज्ञान से मंडित होने के बाद भी सुंदरदास ने निर्गुण के मूलभूत सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया। उनके ग्रंथों में कबीर और दादू के विचार नयी भाषा और अभिव्यंजना शैली में व्यक्त हुए हैं। इस शोध आलेख में दोनों कवियों की कविता की विशेषताओं का विवेचन किया गया है।
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Pages:124-130
How to cite this article:
हरिराम "दादू पंथी संत सुंदरदास का काव्य". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 124-130
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